गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

खुश रहिये आबाद रहिये,
 दिल्ली नहीं तो गाजियाबाद रहिये,
 जहाँ भी रहिए सुल्तान रहिये,
ग़ालिब नहीं तो गुलजार रहिये,
अदब  नहीं आती तो बिंदास रहिये ,

जितना हो हल्ला हो सके मचाते जाइये,
पर ठुमरी के ताल पर ठुमके तो लगाते जाइये,

यहाँ पर कोई  लेलिन, कोई मार्क्स, कोई गांधी बैठा है,
अपनी बातो में आरे हाथ लिए बैठा है,
कोई गाता नहीं गीत, बजाता नहीं ताल है,
पता नहीं दिल्ली की कुर्सी पर किसका नाम है ?????
(C) किशोर कुणाल। .......
 

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