शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

पंच तत्व प्रवीन,

मै हुँ महा महीम,

विश्वास के रथ पर सवार हुँ,

ज्ञान  का अस्त्र  रखता हुँ साथ,

रण भूमि  का रणवीर हुँ,

कुरुक्षेत्र  का कृष्ण,

चचंलता है प्रकृति  मेरी,

शांति  का आचरण है,

पंच तत्व से प्रवीन,

विश्वास  के रथ पर सवार,

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

सपूत

"""मुझे अपनी किसमत इतिहास के पन्नो पर कुछ ऐसी अदा से लिखना है कि,

हिन्दुस्तान की प्रत्येक माँ चाहे मुझे तुझ जैसा ही सपूत जन्म देना है"""

(किशोर कुणाल)

शनिवार, 17 सितंबर 2011

"" तिज़ारत ""

""""हमने ज़रा सा झटका क्या दिया तो तुम्हे धोखे का एहसास हो रहा है,
तुमने जो ताज़िनदगी हमे ज़ो तिज़ारत दिखायी उसका क्या???"""""

(किशोर कुणाल)

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

प्रेम के प्रति एक दृष्टिकोण

कभी कभी किसी अपरिचित का विचार आपके दृष्टिकोण को बहुत प्रभावशाली तरिके से बदल देते है। हमारे मानसिकता में प्रेम की जो सहज परिभाषा होती है पहली नजर वाली जैसा फिल्मो में दिखाते है सच मानीयें प्रेम की वास्तविक परिभाषा काफी विस्तृत होती है ।प्रेम दो प्राणियों के मध्य वह मानसिक आैर आत्मिक क्रिया है जो आकर्षण से प्रारम्भ होकर समर्पण पर से अस्तित्व में आती है और अंनत तक चलती हैँ।जिसमें कई स्तरो का समावेश होता है। जिसमें आकर्षण के साथ साथ विश्वास, मित्रता , आपसी सहनशीलता तथा अंत मे समर्पन जो अत्यंत महत्वपूर्ण है का समावेश होता है।मानव आकषर्ण से प्रराम्भ होकर विशवास के राह पर चल कर मित्रता के मोड़ से आपसी सहनशीलता रखते हुए समर्पण की सीढी पर चढता है और प्रेम को प्राप्त कर जीवन के सफर में आगे बढते है। यही है वास्तविक प्रेम है जैसा राधा कृषण का था। एक बार की बात है राधा जी कृष्ण जी से पूछती है हे नाथ आपने प्रेम मेरे साथ और व्यवहार अर्थात विवाह रूपमणी के साथ यह अन्याय मेरे साथ क्यों किया ?
कृष्ण जी बड़ी रोचक और सुंदर तरह इसका जबाब दिया उन्होने कहा राधा व्यवहार दो लोगो के मध्य किया जाता है लेकिन हम दोनो तो एक ही है न।

( किशोर कुणाल )

रविवार, 11 सितंबर 2011

"""मैं दिन मे सपने देखने लगा हूँ"""

आज कल रात में नीद नहीं विचार आते है,
सपनो की जगह पर खयाल आते है,
शतरंज की बिसात पर मंत्री बन बैठा हूँ,
अपनी बागडोर भविष्य के हाथ रख छोड़ा हूँ,
पता नहीं क्यों,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ,
खूद अपने आप से लड़ने लगा हूँ,
अपना ही प्रतिव्दन्दी बन बैठा हूँ,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ!!!

(किशोर कुणाल)

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

मेरी समस्या

मेरी समस्या बहुत पूरानी है
यह न तो कथा और न कहानी है
कोई बड़ी बात नहीं बस हम तुम की एक छोटी सी जिन्दगानी है
दुख सुख के पल है इसमें
पता नहीं साथ मे थोड़ी प्ेरम कहानी भी है
भावनाओं की उड़ान है इसमें
कुछ अनचाही कुछ अनकही बाते हैं इसमें
यह बात कुछ पूरानी है मेरी समस्या बहुत पूरानी है एक छोटी सी मुलाकात थी किसी से
न ही कोई पूर्व पहचान थी
चिलचलाती धूप बड़ी थी गर्मी की बह दोपहर थी
भीड़ मे मै अकेला था वह अकेली थी
पता नहीं कुछ बात थी
मैं यही सोच रहा था इतने में उसने टोक दिया
मदद की वह गुहार थी
मैं असहज सा और थोड़ा घबराया
पता नहीं क्या बात थी
शायद यह पहली मुलाकात थी
उसने कुछ ऐसा कहा की जो अनकही बात थी
मै कुछ सकपकाया तथा सोच मे पड़ा
फिर देखा सभ्य तथा शिक्षत वह कन्या थी
उसकी समस्या को सुलझाया मैने
जो एक छोटी सी बात थी
बड़े सभ्य तरीके से धन्यवाद कहा उसने
फिर कुछ ऐसा पूछा उसने जो मेरे लिए चौकने वाली बात थी
जो जीवन मे पहली ऐसी परिस्थिती थी
मेरे उत्रर का कुछ देर इन्तेजार के बाद मुस्कुराहट से मेरा धन्यवाद दूसरी बार चुकाने बाद वह चली गयी
उसकी मुस्कुराहट में कुछ तो बात थी
शब्दहीन खड़ा उसके प्रशन का उत्रर ढूढता कुछ देर वही पर खड़ा मैं फिर अपने मंजिल को चला
यह कहानी कुछ पुरानी थी
हम तुम से भरी एक छोटी सी जिन्दगानी थी
मेरी समस्या बहुत पुरानी थी
भुड़सत के पल में यही सोचता हूँ
शब्दहीन खड़ा न रह कर उसके प्रशन का जबाब देता
मै कम से कम उसका फोन न0 तो लेता मैं
शायद बाद में ही जबाब देता
यही एक मेरी एकाकी थी
हम तुम की एक छोटी सी कहानी थी
मेरी समस्या बहुत पूरानी थी
मेरी समस्या बहुत पूरानी थी

बुधवार, 7 सितंबर 2011

हमारा देश अब कायर दिखता है

हमारा देश अब कायर दिखता है,
कड़ोरो की भीड़ अपनो की मौत का बेशर्म तमाशा देखता है,

अब बम धमाके बस HEAD LINE बन चुके है,
अपनी कायरता के प्रमाण पत्र बन चुके है,
संसद से लेकर हाई कोट तक नाक बची कहा है,
लगता है सरकार को अब तक लज्जा आयी कहा है,

वो तो नामर्दो की टोली है,
जो भीड़ पर वार करती है,
हम तो सबल है,
फिर क्यों अब तक कसाब को पाले बैठे है,
क्या पौरूष को हमने खो दिया है,
जलालत की जिन्दगी को अपना लिया है।
(किशोर कुणाल)

रविवार, 4 सितंबर 2011

जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण

जीवन मे कुछ परिस्थितिया ऐसी होती है जिसमे  आदमी अपने आप को पहचानता है अपना दिशा  निर्धारण  करता है अपनी प्रकृति से समझौता कर अपनी प्रकृति में  भी परिवर्तन लाता है अपनी बुध्दि से विवेक  का निर्माण  करता है।हर कोई जीवन को अपने अनुसार समझता है उसे परिभासित करता है जहाँ तक मेरा प्रशन मै इसे वह सड़क मानता हूँ जिसमे  कई मोड है साथ मे speed breaker भी चाहे जीतनी  धीरे से जाओ झटका लगना ही है।उपर से एक यथेच्छाचारी होने की भी कीमत  चुकानी पड़ती है। कभी कभी शासन की इच्छा अनुशासन भुला देती है।भौतिकी का एक सिधांत  है प्रत्येक तत्व की क्रिया  प्रतिक्रिया   विश्व के हर तत्व से जुड़ा होता है जैसे कही एक तितली  का फरफराना विश्व  के दूसरे कोने मे तुफान की वजह बन सकती है।जीवन पर भी यह सिधांत  सही बैठता है।किसी  अपरिचित का छोटा सा कदम भी किसी  के सफलता असफलता की वजह बन सकती है। इसी तरह अपना एक डर दूसरे को बलवान बनाने के लिए  काफी होता है।

(किशोर  कुणाल)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

"""मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया """

आलोचनाओ ने जीवन के दूसरे पहलू से जो मेरा पहचान करवाया,


परिस्थितिथयों ने जो मेरे स्वाभिमान  को कितना चोट पहुँचाया,


प्रत्येक  चोट ने दर्द बयां करने की अदा सीखा दिया ,


मुझे बातो की कलाकारी में  प्रवीण बना दिया ,


पंगा लेने की प्रबल इच्छा ने भी,

मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया


मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया ....!


(किशोर  कुणाल)