सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मैं वो पृथ्वी हूँ कुणाल जिसकी सयुक्ता नहीं मिलीहै

मैं वो पृथ्वी हूँ कुणाल जिसकी सयुक्ता नहीं मिलीहै 
एक यथेकछाचारि विचारक को उसकी मार्यादा नहीं मिली है 

मैंअपनी काव्य कृति से कुणाल बन बैठा हूँ 
अपने अनुरागी मन मेंअनामिकाकी अभिलाषा रखा हूँ 

मैंअब अस्तित्व से अवस्था की ओर बढ़ रहा हूँ 
वृहद् विस्तृत व्यापक एक विचारक बन रहा हूँ 

अब सभ्य सभ्यताऔर संस्कार के अंतर से ऊपर उठ रहा हूँ
मैंकुणाल कुंदन कमल क्लिष्ट बन रहा हूँ

न तुम्हारे समझ में हूँ न सोच में और न सीमा में
मैं मेरा और मेरेनहीं हम हमारा और हमारेके अंतर समझ रहा हूँ

कुछ कृत्य मेरे क्लिष्ट बन चुके है
मेरे अधिकार ही मेरेकर्त्तव्य पर प्रभावि बन चुके है

सूर्य की किरण अपनी कृति सेकर्ण बना चुकीहै
मातृ मित्र मार्मिकता से वंचित करा चुकी है

अब अपराध बोध मेरी बौद्धिकता पर हावी हो रहाहै
कृष्ण वर्ण कुणाल कालिदास बन रहा है।।।।।
©किशोर कुणाल।।। 

बहुत लिख चूका हूँ ख़ुद को,

बहुत लिख चूका हूँ ख़ुद को,
अब बस पढ़ना चाहता हूँ ख़ुद को,
सर पर माँ की हाथो कि थपकिया चाहता हूँ
एक मासूम सी नींद अब सोना चाहता हूँ
कुछ बनाना कुछ सजाना चाहता हूँ
जिंदगी को अब गुनगुनाना चाहता हूँ
जिस नज़्म को डायरी में गुलाब के साथ बंद रखा था
उसे जिंदगी के धुन पर गुनगुनाना चाहता हूँ
बस एक सिसक रह गई है "कुणाल" मासूम मोहबत वाली,
जिंदगी में वो ग़लती हर बार दोहराना चाहता हूँ
तू चाहे या फिर न चाहे मैं साथ निभाना चाहता हूँ।।।।।
©किशोर कुणाल।।।

मैं ज़िगर में खून को गर्म रखता हूँ

मैं ज़िगर में खून को गर्म रखता हूँ
सरेआम सच बोलने का माद्दा भी रखता हूँ
तेरे हर लफ़्ज के हर फर्क को समझता हूँ
तेरे हर लहज़े को मद्देनज़र रखता हूँ
एक नज़र मंदिर पर तो एक नज़र मस्ज़िद पर रखता हूँ
मैं अपने घर में गीता के साथ क़ुरान भी रखता हूँ
दिल में अग़र बग़ावत है तो मोहबत भी रखता हूँ
मैं तेरा दिया हुआ गुलाब आज भी अपनी किताब में रखता हूँ
माना शाहजहाँ नहीं तू इस हिंदुस्तान का "कुणाल",
कोई जान लूटा कर देख एक ताज महल बनाने की हिम्मत भी रखता हूँ।।।
©किशोर कुणाल।।।।

मैं युही शब्दों को कविता की शक्ल नहीं दे देता हूँ

मैं युही शब्दों को कविता की शक्ल नहीं दे देता हूँ
जब दिल में विचारो के घर्षण से आग लगती है सीने में, तब कलम से लहू निकल जाते है
मैं युही लफ्ज़ो को नज़्म में ढाल नहीं देता हूँ
जब जज्बातों की शाखों पर मुहब्बत की नई कोंपले खिलती है तब रोशनाई से खुशबु निकलने लगती है
मैं युही भावनाओं की साज पर अपनी गजलें गुनगुनाता नहीं हूँ
जब सुन्दर एहसासो से सराबोर हो जाता हूँ तब क़लम की शिराओं से फूल झरने लगते है
मैं युही एक एक अरमानों को अपने शायरी में नहीं पिरोता हूँ
जब मन भी हिरण की तरह जंगल में भटकता है तब कलम गीत मल्हार गाने लगती है
बस युही क़ैद कर लेता हूँ "कुणाल" कागज़ में खुद को,
जब कभी बाँसुरी की धुन पर कोई मीरा खो जाती है बेवफ़ाई में कोई कालिदास बन जाता है, जब अभिमान में महाभारत हो जाता है और वर्षो बाद जब किसी मजनु की मज़ार पर कोई चादर चढ़ाता है तब एक मेरी लेखनी भी भावनाओ के रंग उगलती है।
© किशोर कुणाल।।।।

सदियों से ख़ामोश है जो

सदियों से ख़ामोश है जो
उसकी तपस्या क्या समझोगे
मुस्कुराते हुए चेहरे का
तुम दर्द क्या समझोगे
दिल में ख़ामोशी से चुभा है नश्तर जो
उस जख़्म की टिस क्या समझोगे
वख़्त की रेत पर जो ख़त लिखा था "कुणाल"
तुम उस ख़त का मजबुन क्या समझोगे
मैंने सिर्फ लिखा था "एहसास -ए-कुणाल"
तुम अल्फ़ाज भी सिर्फ क्या समझोगे
समझोगे तुम भी किसी रोज़ "कुणाल" को
जब समझोगे समंदर की मिलकियत रखने वाले की एक बूँद प्यास को
जब ज़िन्दगी का फलसफ़ा कभी अधूरा रहेगा
जब रंग किसी तस्वीर में अधूरी देख पाओगें
जब ज़नत और जहन्नुम का फर्क समझोगे
©किशोर कुणाल।।।।

ख़तरे से ख़ाली नहीं, ये दिलों की आज़माइश

ख़तरे से ख़ाली नहीं, ये दिलों की आज़माइश
हम डूब कर देखे हैं तेरी आँखो की गहराई
आसान नहीं है कोयले की कोठरी से बेदाग़ बच के निकलना
हम नज़रों से गिर कर देखे है बदनामी मेरे गिरेबां तक कैसे आई
होते है कुछ दिलेर भी जिन्हें मज़बूरी बुज़दिल बना देती हैै
हम घुटते देखे है उन्हें जिन्होंने परिवार के ख़ातिर साहस कैसे गवाई
भीड़ बड़ी उमड़ी थी उस आशिक़ के जनाज़े पर
हम कंधा देकर देखे "कुणाल", वफ़ा करके किसी ने बेवफ़ाई कैसे पायी
हम बयां कैसे करे अपनी हक़ीक़त खुद "कुणाल"
समझौता कर कर के देखे है घुट घुट के मौत किस्तों में कैसे आयी ।
©किशोर कुणाल।।।

"कुणाल" चेहरे के साथ लहज़े याद रखता है

"कुणाल" चेहरे के साथ लहज़े याद रखता है
जहाँ नफरत हो वहाँ मुहब्बत की गुंजाइश याद रखता है
तफसिया (समझौता) करने बैठे थे जो
पीठ पर लगे ख़ंजर को याद रखता है
सियासती आदमी से बच कर निकलता है
लोमड़ी की प्यारी सी सूरत याद रखता है
है बहुत मशले जो सुलझे नहीं अबतक
मुद्दे भी याद रखता है मशला भी याद रखता है
मत छेड़ो पुराने ज़ख्मो को भाई
बटवारे की वो शाम याद रखता है
माना सिर्फ बेवफाई नहीं मेरी शायरी की वजह
"कुणाल" तो हरे ज़ख्मो के साथ मुस्कुराहट भी साथ रखता है।।।।
© किशोर कुणाल।।

जिस्म से ज़मीर तक का ख़ुलासा चाहती थी

जिस्म से ज़मीर तक का ख़ुलासा चाहती थी
वो मेरे वजूद का हिस्सा चाहती थी
मैं इनकार तो वो इज़हार चाहती थी
कुछ ज़ख्मो की वह दवा चाहती थी
आज ये रात भी क्या खता कर गयी "कुणाल"
मेरे हिस्से में आने वाली पूर्णिमा चाहती थी
मैं तनहाई की चादर ओढ़े सिसक रहा सर्दी में
वो मौसम की पहली बरसात में छाता चाहती थी
खुदगर्ज़ी में ये कैसा सितम कर दिया "कुणाल"
वो दो क़दम ही चलने वाला सिर्फ़ दोस्त चाहती थी
ख़ामोशी से गिर गयी जो ख्वाइशों की इमारत "कुणाल"
वो तो अब हर तालुकात मुझसे ख़त्म चाहती थी
सुनसान सड़क पर वो अपना मकान अलग चाहती थी।।।
© किशोर कुणाल।।

सियासती लोगों कि सूरत में सीरत पकड़ नहीं आती

सियासती लोगों कि सूरत में सीरत पकड़ नहीं
आती
संविधान के हाशिये पर लोकतंत्र कायरों की भीड़ है कहलाती
सियासत के खेल के खिलाडी जो है बने, उनके सर से ताज नहीं जाती
वंशवाद के बुनियाद पर नए हाथो पर बागडोर नहीं आ पाती
आती है तो बस कुछ ऐसी तक़लीफ़ "कुणाल"
कि सियासत मजहबी जख़्म भर नहीं पाती।।।
©किशोर कुणाल।।।

कैसे कर दी ऐसे वख़्त में उसने ईमानदारी की बात

कैसे कर दी ऐसे वख़्त में उसने ईमानदारी की बात
नहीं जानता था शायद भूख क्या है
बेटी की शादी कर दी उसने पुरखों की जमीन बेच कर
नहीं समझा था वो बाप समाज का दस्तूर क्या है
मोहब्बत में कर दी उसने चाँद तारे तोड़ लाने की बात "कुणाल"
नहीं समझा इश्क़ का अंधा, मर्द की जुबान क्या है
गरीब की बेटी जल गयी दहेज़ की आग में "कुणाल"
नहीं समझा वो बाप मुफ़लिसी का अंजाम क्या है
वो मासूम नहीं समझी जवानी और बचपन का फर्क
किसी ने नहीं बताया उसको कि उस मोड़ पर दरिंदा बैठा है
नीति खोजती है जनता राजनीति में "कुणाल"
नहीं समझती है जनता गठबंधन की सरकार क्या है
मेहनत खोजती है वक़ालत मेरी उम्मीद से ज्यादा
नहीं जनता था "कुणाल" धुप में नंगे पाँव चलना क्या है
©किशोर कुणाल।।।

दिल से लिखू या दिमाग़ से लिखू

दिल से लिखू या दिमाग़ से लिखू
तुम्हारे लिए कोई ग़ज़ल बेमिशाल लिखू
दिल की काग़ज अब तक कोरी है
क्या तुम्हारी यादों के नाम पर क़ुरान लिखू
पत्थर से टकराते टकराते घायल हो चुके हाथ
तेरी मूरत पर मैं कैसे अपना नाम लिखू
कुछ बाते कुछ मुलाकाते हर लफ़्ज हर लहज़ा
तेरी बातें भी मैं कैसे सरेआम लिखू
शायद तूने अपने डायरी के आख़री पन्ने भी भर दिए
अब बता अपने नाम का कैसे पहचान लिखू
जख़्म से ज़्यादा अब ज़मीर तक़लीफ़ देती है "कुणाल"
तेरे मुहब्बत के दस्तावेज़ पर मैं अपना दस्तख़त किस अदा के साथ लिखू
©किशोर कुणाल।।

ज़ख़्मी विचारों पर कोई उपचार नहीं लिखता.....!!

ज़ख़्मी विचारों पर कोई उपचार नहीं लिखता.....!!
मैं कितना विप्लवित हूँ मेरे संघर्षों पर कोई इतिहास नहीं लिखता...!!
बहुत कुछ घटता है अदभुत "कुणाल" तेरी ज़िन्दगी के रंगालय में..!!
मुझपर लिखने वाला कभी तुलसीदास नहीं मिलता तो कभी कालिदास नहीं मिलता...!!
जानें कैसे किसी को मीरा कभी किसी को झूठा खिलाने वाली सबरी मिल जाती है..!!
मुझे तो "कुणाल" कभी समर्पण से देख सके चाँद को देखने वाला चकोर नहीं मिलता।।
©किशोर कुणाल।।

अपने आस पास हर शख्स से उकता चूका हूँ

अपने आस पास हर शख्स से उकता चूका हूँ 
कुछ दोस्त हैं और कुछ दुश्मन है सबको आजमा चूका हूँ
खुदगर्ज़ी में उलझा बेखुद बेबाक सा हूँ 
बेरहम बेतरतीब बेशर्म सी ज़िंदगी
कभी फ़क़ीरी तो कभी अमीरी अपनी परछाईं में खोयी खोयी सी जिंदगी
©किशोर कुणाल

कर्मपथ पर कर्मी, मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ

कर्मपथ पर कर्मी, मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ
मैं कुणाल संघर्षपथ पर कदम बढ़ा रहा हूँ
अश्रु रक्त मिश्रित मैं घूंट घूंट पी रहा हूँ
मैं वख़्त कि धारा के विरुद्ध तैर रहा हूँ
द्वन्द है प्रतिद्वन्द है घात और प्रतिघात सह रहा हूँ
मैं पांडवों वाले अज्ञातवास में रह रहा हूँ
ये अग्निपथ जटिल है कर्म पथ कठिन है
मैं कर्ण कुरुक्षेत्र में गड्ढे से रथ का पहिया निकाल रहा हूँ
था वो अभिमन्यु जो फंस गया चक्रभियु में
मैं कृष्ण अपनों के लिए अब शस्त्र उठा रहा हूँ
मैं अपने कर्मो को अर्पित कर चूका, अब अपने बंधनो से मुक्त हूँ
मैं कुणाल अपने क्लेशों से अब अपराधों से मुक्त हूँ
ज्ञानरथ पर सवार गाण्डीव उठा रहा हूँ
मैं 'कुणाल' शँखनाद बजा रहा हूँ।।
©किशोर कुणाल

"कुणाल" चिराग़ चाहिए सिर्फ रौशनी के लिए

"कुणाल" चिराग़ चाहिए सिर्फ रौशनी के लिए
एक दीपक काफ़ी है दीवाली के लिए
मुस्कान चाहिए चेहरे पर रौनक के लिए
सादगी काफी है तुम्हारी खूबसूरती के लिए
बस हमसफ़र चाहिये जिंदगी के लिए
इक मुसाफ़िर भी काफ़ी है हुजूम के लिए
©किशोर कुणाल

वख़्त हर जख़्म का एक जबाब रखता है

वख़्त हर जख़्म का एक जबाब रखता है
जख़्म की निशानी अपने पास रखता है
पसीने की कमा कर खाने वाला ख़ुद्दार
अपनी आवाज बुलंद सरेआम रखता है
जिसको कहता रहा मुझपे ऐतबार कर
वो हर इल्ज़ाम मुझपर तैयार रखता है
है ऐसे भी ख़ुशनसीब जो कभी उलझे नहीं इश्क़ में
"कुणाल" वो है जो सबके दिल पर एख़्तियार रखता है ।।
©किशोर कुणाल

गर्म रोटी की खुशबु जिन्हें पागल कर देती है

गर्म रोटी की खुशबु जिन्हें पागल कर देती है
मासूम बच्चों की बौखलायी भूख, ये सही नही
चुनावी मौसम में मज़हबी तानों की बारिश
मेरे मुल्क में दंगो के हालात, ये सही नही
कहते हो तुम की मेरा चाल चलन ठीक नहीं
कैसे समझाऊ जलन तुम्हारी, ये सही नहीं
भारी बारिश और मिट्टी का बदन "कुणाल"
शमशान में अधजली लाश,ये सही नहीं
©किशोर कुणाल

मैंकायस्थो के वंश का अंश हूँ

मैंकायस्थो के वंश का अंश हूँ
लेखनी मेरी प्रकृति है
काव्य मेरी आत्मा
बुद्धि मेरी जीविका
कर्म मेराधर्म
और धर्म मेरा अस्तित्व है।
मैंकायस्थ कुल का उद्भव हूँ
संघर्ष मेरी एक मात्र विराशत है
विवेक मेरी कुल सम्पदा
अभिव्यक्ति मेरी पहचान
ज्ञान मेरास्वाभिमान
और स्वाभिमान मेरे लिए स्वाधीनताहै।
मैंचरित्रों में चित्रांश हूँ
मैंयर्थाथ के युद्ध का योद्धा
मैंकुरु के राष्ट्र का ऋणी
मैंकाव्यकृति "कुणाल" हूँ।
© किशोर कुणाल ।।

ज़मीन जिसको मिली नहीं कभी आसमां भी उनको मिला है

ज़मीन जिसको मिली नहीं कभी आसमां भी उनको मिला है
हम जैसे काफिरों को भी कभी ख़ुदा मिला है
हर सफ़र हर मोड़ पर जिनकों मिले पत्थर
ऐसे मुसाफ़िर को भी कभी शहर मिला है
इतना रोया हूँ जख़्म ताज़ा रख कर सीने में,
ऐसे आँखों को मुस्कुराहट का भी कभी साथ मिला है
जो कहना है साफ़ कहो शिक़वे हो या शिक़ायत
कब तुम्हारी ख़ामोशी से भी कभी सुकून मिला है
कौन भूला है ‘कुणाल’ वो मोहब्बत का फ़रेब, वो हिज्र का दर्द
जागती आँखों से देखें जिसने ख़्वाब उनको भी कभी रात में नींद मिला है ।।
©किशोर कुणाल

एक लम्हें में सदियों की ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये

एक लम्हें में सदियों की ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये
कुछ ऐसा कीजिये कि बदनामी का भी मज़ा लीजिये
सिकंदर भी मरा वो भी तरप तरप के मरा
मिली अगर बादशाहत तो फ़क़ीरी का भी मजा लीजिये
आतंकवाद जब सितम ढाये इंसानियत पर
तो दहशत के बग़ीचे में बारूद की खुशबु का भी मज़ा लीजिये
जब खंजर दे ही दिया अपनों के हाथों में
तो किश्तों में खुदखुशी का भी अपना मजा लीजिये
है बहुत से फ़साने ज़िन्दगी के "कुणाल"
कि फ़िरकापरस्त दोस्तों के वफाओं का भी मजा लीजिये
©किशोर कुणाल

खुलेआम मुझको जो बदनाम करता है

खुलेआम मुझको जो बदनाम करता है
हर जगह मशहूर मेरा नाम करता है
मेरे काम को ख़राब हर बार कहता है
वो जानता नहीं मेरा प्रचार सरेआम करता है
मुझपर खड़े वो कितने सवाल करता है
हर बार मुँह तोड़ उसको जबाब मिलता है
सबकों खुश कर पाना नामुमकिन है "कुणाल"
ईट का जबाब पत्थर से देने को तैयार रखता है।।
©किशोर कुणाल

अच्छे को अच्छा और बुरे को सजा मिलेगी

अच्छे को अच्छा और बुरे को सजा मिलेगी
जिसनें किया सबका भला उसको मारने की क्या वजह मिलेगी ?
दुनिया के हमाम में सब है नंगे
तुम्हें बदनाम करने को भला किसी को क्या वजह मिलेगी ?
जिसके लिए पैसा ही ख़ुदा हो जाय
उसको आँखों में पानी और ज़मीर की सच्चाई क्या मिलेगी ?
जो इंसानियत का एक फ़हलसपा न समझ पाये
उसको ज़िन्दगी में कभी मोहब्बत और वफ़ा की क्या निशानी मिलेगी ?
ज़िन्दगी कटनी है तो कट जाए संघर्षों के नाम पर
"कुणाल" ख़ुद्दार होने की भी तुझे अब सजा मिलेगी।।।
©किशोर कुणाल

माँ के आँख के तारे, पिता के ज़ान है हम

माँ के आँख के तारे, पिता के ज़ान है हम
सच में कितने कमाल है हम
ज़मीन चीरने को, आसमान छूने को तैयार है हम
कैसे कहे कितने जवान है हम
आँखों से आग़,चेहरे से नूर है हम
जो देखें तो कोई कितने खूब है हम
दिलों पर छाने को , रात की नींद उड़ाने को जिम्मेदार है हम
अब बताते है तुम्हें दिल के क़रार है हम
इश्क के मरीज़ और तनहाई के शिकार है हम
तेरे इंतेज़ार में कब से उदास है हम
दुनिया समेंटने को, औरों से निपटने को तैयार है हम
"कुणाल" सच में बिलकुल बबाल है हम
©किशोर कुणाल

दिल दर्द का टुकड़ा है जिसका मरहम नहीं मिलता,

दिल दर्द का टुकड़ा है जिसका मरहम नहीं मिलता,
खुला जख़्म है जो कभी नहीं भरता,
गहरा घाव लगा मन में, वो पस नहीं निकलता,
एक जवालामुखी सा है हर लम्हा जो दहकता
मेरी सफ़ीना (नाव)फ़सी तूफ़ानों में, उसका किनारा नहीं मिलता,
एक बंद गली सी है जो राह आगे नहीं निकलता
तुमसे दर्द मिला मुझकों, उसका एहसान नहीं चुकता
एक तस्वीर बनाता हूँ, जिसका चेहरा नहीं मिलता
वो तक़लीफ़ जमी है बर्फ में, वो लम्हा नहीं पिघलता
"कुणाल" लाख ठिठुरता रहूँ, उसको फर्क नहीं पड़ता ।।
© किशोर कुणाल

समंदर भी जिसकी तलाश में रहे

समंदर भी जिसकी तलाश में रहे
वो कतरा अपनी पहचान रखता है
लहू के एक क़तरे का नाम है इंसान
जो गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलता है
एक लफ़्ज में सिमटी परी है कहानी
वो मत्ला ग़ज़ल की बुनियाद रखता है
तुम में जो सिमटी परी है सादगी
सौंदर्य भी एक अलग अल्फ़ाज रखता है
चन्द जज्बातों की भेंट चढ़ी पत्तियाँ
वो मेहबूब के हाथों पर हीना रखता है
पूरी दुनिया ही फरेबी है 'कुणाल'
हर हक़ीक़त जो अपनी छुपाकर रखता है ।।
© किशोर कुणाल

आहिस्था आहिस्था जो नसों में उतर जाता है

आहिस्था आहिस्था जो नसों में उतर जाता है
नशा वो होता है जो लहू में बिखर जाता है
साँवली सूरत पर जब सीरत का निखार आता है
मुहब्बत वो होता है जो बुढ़ापे में नज़र आता है
कतरा कतरा फ़क़ीर का फ़ना हो जाता है
ख़ुदा वो होता है जो दुआओं का एहसास कराता है
अज़नबी आँखों के समन्दर में कोई भटक जाता है
आशिक़ वो होता है जो ज़िगर में पनाह पाता है
कैसे न कोई थकान और न कोई ख़लिश पाता है
इश्क का अँधा वो है जो कशिश में खो जाता है
एहसासों को कोई यूही अंदर भटकने को छोड़ जाता है
शायरी वो है "कुणाल" जो सुलगता हुआ छोड़ जाता है ।।
©किशोर कुणाल

जैसे मन है मेरा वैसा संग चाहिए

जैसे मन है मेरा वैसा संग चाहिए
प्रीत में रचा बसा एक चमन चाहिए
पीर का समंदर तुम्हारे अंदर बसा
मेरे आँखों को भी अब अश्क चाहिए
जीतना उलझा हूँ अब सुलझना चाहिए
तुम्हारे हाथों से हर गाँठ खुलनी चाहिए
सारे कांटे अब चुन लेगें एक एक करके हम
मेरे साथ चलने को तुम्हारा हौसला चाहिए
"कुणाल" मुश्किलों में चलेंगे हर कदम हर कदम
एक कदम एक कदम चलने को हसफर चाहिए
©किशोर कुणाल।।

जीवन पथ का संघर्ष

मेरे विकट गति के अनुकूल नहीं, ये विश्व की असफलता है 
मेरा ह्रदय गुलाब है कोमल है जीवंत है, ये उसकी मर्यादा है
मैं स्वार्थी हूँ कठोर हूँ संवेदनहीन हूँ क्या करू संघर्षपथ की आशा है
ये जीवन मुझे मुफ़्त में नहीं मिला, जाने कितने युगों की तपस्या है
जब प्रथम प्रभात की अवस्था में अपने दोनों भुजाओं को स्वतंत्र करता हूँ
तब समस्त् सकल विश्व मेरे भुजाओं में कैद हो जाता है
तब रक्त अपने सम्पूर्ण आवेग में मस्तिष्क की ओर केंद्रित हो कर मुझे मेरे लक्ष्य की चाह जगाता है
और मैं पथकर्मी अपना धर्म निभाता हूँ।।
"कुणाल" जानता हूँ मन मेरा प्रीत है प्रेम मेरा मनोबल है और संवेदनशीलता मेरी प्रकृति है ।
जीवन के पथ पर यही मेरा संघर्ष है ।।।
©किशोर कुणाल

आज सोचा की एक विचार लिखूँ ।

आज सोचा की एक विचार लिखूँ ।
अपनी जाती ज़िन्दगी सरेआम लिखूँ ।
ज़िस्म से ज़मीर तक ज़ख्मो का सारांश लिखूँ ।
तुम ही बताओ हताशा लिखूँ या अपमान लिखूँ ।
मैं वो चाणक्य जिसकी शिखा अब तक खुली।
दौपदी के खुले बालों पर महाभारत का परिणाम लिखूँ ।
है कुछ अपमान के पल "कुणाल"
जिनपर आघात लिखूँ या प्रतिघात लिखूँ
अब नहीं कहता मैं किसी से प्रेम बात
वो चाँद, वो सौंदर्य,वो बहार की बात
दिल के शाखों पर मुहब्बत की कोपलों की बात
एक भँवरे की फूलों पर मँडराने की बात
वो मीरा की बात वो राधा की रास
ऐसे कैसे दुनिया मानेगी "कुणाल"
छाती पर खाये प्रहार लिखूँ या पीठ पर खाये घात लिखूँ
तुम ही बताओं मुझको अपनी संवेदनाओ अब क्या लिखूँ।।।
©किशोर कुणाल

बीमार दिल को थोड़ी सी दवा भी दीजिये

बीमार दिल को थोड़ी सी दवा भी दीजिये
नजरें अग़र मिल भी जाय तो मुस्कुरा भी दीजिये
ऐसा नहीं की हम अनजान है दस्तूर ए दुनिया से
ज़माने से सामना हो जाये तो हिम्मत भी रखिये
माना बहुत मुश्किल है हमारा और आपका मिलना
एक बार चाँद तक जाने की पहल तो कीजिये
कुछ न करने से कुछ करना अच्छा होता है "कुणाल"
अपनी नादानियों पर भी थोडा हँस दिया कीजिये ।।
© किशोर कुणाल

छोटी छोटी बात पर कुछ अकड़ जाते हो

छोटी छोटी बात पर कुछ अकड़ जाते हो
इतना लड़ती हो मुझसे की बिखर जाते हो
ज़िंदगी अकड़ गयी है दिसंबर की सर्दी में
और तुम हो कि मुझमे यूँ पिघल जाते हो
देखों संसद का शीतकालीन सत्र भी ख़त्म हो चूका
मैं सत्ता सा चुप और तुम विपक्ष सा भड़क जाते हो
अभी बेवफ़ाई का लगता है कि मौसम आया
तुम कैसे मेरे बग़ीचे से गुलाब तोड़ के जाते हो
ये मेरी सराफत है कि मैं चुप हूँ ज़ालिम
मुझ वकील पर तुम जज की तरह सितम ढाते हो
वक़ालत के दाँव पेंच में फंसा एक वकील "कुणाल"
तुम हो कि वफ़ा का फ़लसफ़ा सुना कर जाते हो
©किशोर कुणाल

उनको उनके सवाल का जबाब देकर क्या करता

उनको उनके सवाल का जबाब देकर क्या करता
दिल के दरवाज़े जिनके बंद हो उनको शायरी सुना कर क्या करता
जिनकों एहसास नहीं शब्द शायरी और शराफ़त की
उनको अपनी ग़ज़ल की किताब थमा कर क्या करता
ये कोई नयी बात नहीं की शायर महफ़िल बेइज्जत हो गया
जिन्हें सलीक़ा न हो उन्हें तहज़ीब सीखा कर क्या करता
वाकयी में ये दिसंबर की सर्दी काफी तकलीफ़ देती है "कुणाल"
जब तालुकात ही टूट गए तो ग़ुलाब थमा कर क्या करता ||
©किशोर कुणाल

सुबह से शाम तक एक एक झूठ बिक जाता है

सुबह से शाम तक एक एक झूठ बिक जाता है
तुमको समझ नहीं आता की सच्चा भूखा जाता है
हर रोज जो बस्ता लेकर जाते है सरकारी स्कूलों में खिचड़ी के खातिर
तुमको नज़र नहीं आता की बच्चा फिर भी अनपढ़ कहलाता है
बाप हो तो क्या लिख दोंगे भाग्य बच्चो का अपने हाथ से
तुम पता नहीं करते बच्चा आखिर क्या चाहता है
जब घर से निकल परे तो बढ़ते चलो हौसले के साथ
"कुणाल" जानता नहीं कहीं सहरा तो कहीं पर समंदर भी आता है ।।
©किशोर कुणाल

नश्तर उतर गया सीने में तो लहू का हर क़तरा दुहाई देगा

नश्तर उतर गया सीने में तो लहू का हर क़तरा दुहाई देगा
पीठ में खायी है खंजर मैंने इसकी कौन गवाही देगा
देखों बस चन्द घंटे और बाकी है इस तन्हा सर्द दिसंबर के
अगले साल शायद कोई तो दिल के दरवाजे पर दस्तक देगा
ये सियासत है मेरी जान यहाँ किसी का कोई भरोसा नहीं
किसी न किसी दिन कोई पीठ में ख़ज़र उतार ही देगा
ये आइना तिलस्मी नहीं तुम्हारा ज़मीर है
तनहाई में देखो सच्चाई दिखा ही देगा
मुंसिफ बनने का शौख नहीं "कुणाल" तो वकील ही रहेगा
आखिर ख़ुदा के काम में भला क्यों दख़ल देगा
©किशोर कुणाल

प्रेम वही कर सकता है जिसमें परित्याग की भावना हो

प्रेम वही कर सकता है जिसमें परित्याग की भावना हो
और जीवन वही दे सकता है जिसमें दर्द सहने की संभावना हो
हर कोई कहाँ काबिल होता है जिम्मेदारी उठाने को
जिम्मेदार तो वही बन सकता है जिसमें संघर्षरत रहने की आशा हो 
©किशोर कुणाल

हर लफ़्ज हर अल्फ़ाज में लिख जाता हूँ खुद को

हर लफ़्ज हर अल्फ़ाज में लिख जाता हूँ खुद को
अपने ही नगमो में अधूरा छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी लम्हों की बगावत में दहकता छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी ख़ामोशी भरी तनहाई में पिघलता छोड़ जाता हूँ खुद को
ये जिंदगी खुशी भी है गम भी है मेरे हुजूर
कभी कतरा कतरा अश्कों में लुढ़कता छोड़ जाता हूँ खुद को
तो कभी मोती मोती मुस्कुराहट में चमकता छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी जीत जाता हूँ तो कभी शिकस्त खाता हूँ "कुणाल"
मैं जब ग़ज़ल करता हूँ तो बेबाक सा बेतहासा छोड़ जाता हूँ ख़ुद को।।।।
©किशोर कुणाल

ज़िन्दगी में मज़े लेना हो तो थोड़ी जोख़िम उठाया करों

ज़िन्दगी में मज़े लेना हो तो थोड़ी जोख़िम उठाया करों
अग़र मोहब्बत पाना है तो शायर से नजदीकियाँ बढ़ाया करो
यहाँ दिल, दर्द, जख़्म, दवा, आरज़ू , ख़्वाब जाने क्या क्या है
अग़र ज़िन्दगी का लुफ्त उठाना हो तो थोड़ी तालुकात बढ़ाया करो
रात का तिलस्म टूट गया, उगता सूरज निखर गया
अग़र सपने सच कर के दिखाना हो तो थोड़ी जल्दी उठ जाया करो
तूफ़ानों में कस्ती छोड़ो तैर कर पार करो
अग़र जवानी में कहानी लिखनी है तो इश्क का कारोबार करो
कत्थई आँखो की गहराई कुछ अलग होती है जनाब
अगर जज़्बातों को समझना है तो "कुणाल" के नज्मो को पढ़ा करो
©किशोर कुणाल

खून अब खून नहीं रहा उसे तो पानी कर दिया

खून अब खून नहीं रहा उसे तो पानी कर दिया
बाप की लाश पड़ी रही, भाइयों ने मिलकर बटवारा कर दिया
जिस्म अब जिस्म कहाँ रहा रूह को भी तो बीमार कर दिया
अपना घर तो साफ़ रखा मगर सारा शहर बदबूदार कर दिया
अख़बार को अख़बार नहीं छोड़ा उसे भी बाजार कर दिया
भाई से भाई को लड़वाने को, सियासत के हाथों का हथियार कर दिया
"कुणाल" संसद में क्या नहीं होता है वो भी सरेआम कर दिया
विपक्ष ने फेकी थी कुर्सी, सत्ता ने गालियों की बौछार कर दिया।।।
©किशोर कुणाल

एक लम्हें में सदियों की ज़िन्दगी का मजा लीजिये


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एक लम्हें में सदियों की ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये
कुछ ऐसा कीजिये कि बदनामी का भी मज़ा लीजिये
सिकंदर भी मरा वो भी तरप तरप के मरा
मिली अगर बादशाहत तो फ़क़ीरी का भी मजा लीजिये
आतंकवाद जब सितम ढाये इंसानियत पर
तो दहशत के बग़ीचे में बारूद की खुशबु का भी मज़ा लीजिये
जब खंजर दे ही दिया अपनों के हाथों में
तो किश्तों में खुदखुशी का भी अपना मजा लीजिये
है बहुत से फ़साने ज़िन्दगी के "कुणाल"
कि फ़िरकापरस्त दोस्तों के वफाओं का भी मजा लीजिये
©किशोर कुणाल

दिवाने भी मेरी ग़ज़ल को दिल से सुनाते है

दिवाने भी मेरी ग़ज़ल को दिल से सुनाते है
है कुछ ऐसे भी जो मेरी ग़ज़ल चुराते है
कहते नहीं किसी से बस मुस्कुरा कर जाते है
है कुछ ऐसे भी जो छुपकर मेरी ग़ज़ल पढ़ कर जाते है
दिल के अरमान को जो खुल कर सुनाते है
है कुछ ऐसे दोस्त भी जो मेरा हौसला बढ़ा कर जाते है
दिल की बात दिल में दफ़्न कर के जाते है
है कुछ ऐसे यार भी जो कितनें सवाल छोड़ कर जाते है
शिक़वा नहीं किसी से, न शिक़ायत कर के जाते है
है ऐसे दोस्त मेरे जो "कुणाल" तुझे दिल में बसा कर जाते है ।।
©किशोर कुणाल

प्रिय मैं तुमसे प्रेम करना छोड़ दूंगा

जीवन के संघर्षों से अब हर नाता मैं तोड़ दूंगा
सच कहता हूँ प्रिय मैं तुमसे प्रेम करना छोड़ दूंगा
"कुणाल" कवि क्रोधित, अब अमृत कलश तोड़ दूंगा
मेरे मन मंदिर में बैठी देवी मैं तेरी पूजा करना छोड़ दूंगा
मैं पवित्र आत्मा प्रेम प्रिय
तुम धन उपभोग की तृष्णा प्रिय
मैं वैरागी, सांसारिक उपभोग नहीं दे पाऊंगा
मैं सघर्ष का योद्धा प्रिय, राजसुख नहीं दे पाऊंगा
परन्तु वचन था मेरा मेरी साँसों से
मन के आँगन को तुम्हारे लिए मैं वृन्दावन कर देता
जीवन पथ से हर कांटे चुन प्रकृति के फूल भर देता
मैं सूरा सुंदरी का प्यासा नहीं, मैं जीवन भर कटिबद्ध रहता
तुम्हारे लिए जीवन तो क्या मैं स्वर्ग तक को छोड़ देता
इसलिए मैं कहता हूँ तुम नहीं हो मेरे लायक प्रिय
मैं कलयुग में जन्मा राम मगर तुम नहीं मेरी सीता प्रिय
मैं हूँ गोकुल का कृष्ण पर तुम नहीं मेरी राधा प्रिय
इसलिए मैं कहता हूँ
जीवन के प्रश्नों का अब कोई नहीं उत्तर दूंगा
अब तुमसे प्रिय मैं हर रिश्ता तोड़ दूंगा
जीवन के संघर्षों से हर नाता मै तोड़ दूंगा
सच कहता हूँ प्रिय मैं प्रेम करना छोड़ दूंगा।।
©किशोर कुणाल

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो
खुद में जो घुट घुट कर मरे मुझ सागर की गंभीरता हो
मैं लहरों की चंचलता हूँ तुम तट की स्थिरता हो
चकोर जिस तृष्णा में बैठे तुम चन्द्रप्रभा की शीतलता हो
जो शब्दों में अपनी दवा ढूँढे तुम मुझ कवी की रचना हो
प्रेम प्रिय प्रियतमा नहीं, मेरे मन आगँन की अल्पना हो
कल्पवृक्ष की सोनजुही, स्वर्ग की पारिजात हो
क्षीर सागर के मंथन से निकली तुम तो अमृतपाश हो
मृत कुमार जीवन में तुम नवविवाहिता प्राण हो
सदासुहागन जीवन में तुम यौवन का उपहार हो
देखो "कुणाल" कवी कल्पित बैठा, तुम तो हर्ष का संचार हो
मेरे सांसो के स्पंदन क्रम को रोकती, तुम वीना की तान हो ||
©किशोर कुणाल

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय
वेदों के ज्ञान से उपनिषदों की तृष्णा पूर्ण हो जाय
नहीं लिख सके जो तुलसीदास वो उर्मिला का विलाप हो जाय
लक्ष्मण के विरह का काश राम को एहसास हो जाय
कवि ह्रदय की पीड़ा समझों अश्कों से न समंदर हो जाय
चिंतन के हिमालय से निकले मेरी काव्यगंगा न खो जाय
"कुणाल" कवि विचलित प्रेमतृष्णा का तुम्हे भी एहसास हो जाय
मेरे स्वप्निल स्मृतियों में तुम्हे देखु मुझे पारलौकिकता का एहसास हो जाय।।
©किशोर कुणाल

इस कदर इन्सान को इतना मजबूर मत बनाओ,

इस कदर इन्सान को इतना मजबूर मत बनाओ,
तू अगर ख़ुदा है तो इंसान को क़ातिल मत बनाओ,
ज़ुल्म सह कर जो उफ़्फ़ तक नहीं करते जो लोग
उनके लिए दवा न बना सके तो जख्मों पर नमक मत लगाओ
तमाम रिस्तों को छोड़ कर आ गया हूँ तुम्हारे ख़ातिर
मुझे अपना न बना सकी तो अजनबी तो मत बनाओ
क्या करते हो "कुणाल" तहज़ीब के दायरे में लिखा करों गजलों को
कैसी माँ हूँ बच्चो को शरीफ न बना सकी तो आवारा तो मत बनाओ।।।
©किशोर कुणाल

सादगी से बढ़कर सौन्दर्य हो नहीं सकता

सादगी से बढ़कर सौन्दर्य हो नहीं सकता
तू अगर सोना है तो पीतल हो नहीं सकता
ख़ूबसूरती से भी बढ़कर होती है सीरत की कीमत
तेरे अंदर अगर गुण है तो वो छुप नहीं सकता
आदमी की फ़ितरत भले हो जाय रास्ता रोकने की
जिसको आगे बढ़ना हो उसको कोई रोक नहीं सकता
भले तूने जाने कितने भी जुर्म किए हो
हिसाब का दिन भी आएगा और तू बच नहीं सकता
भले कच्ची उम्र में मोहब्बत का तजुर्बा हो कम
जो बग़ावत कर नहीं सकता वो हाथ थाम नहीं सकता
सच्चे एहसासों की आज भी बहुत कीमत है "कुणाल"
जिसने सच्ची मोहब्बत की हो वो अय्याशी कर नहीं सकता।।
©किशोर कुणाल

पलकों की पहरेदारी में रखा है सपनों को

पलकों की पहरेदारी में रखा है सपनों को
अब नींद का इंतेज़ार क्यों करेंगे
एक तेरे भरोसे पर बेरंग छोड़ा है मन को
उधार के रंगों से जज़्बात को क्यों भरेंगे
दिन रात का फासला रोज तय करता हूँ
भला डर डर कर आखिर क्यों जीयेंगे
चोर तब तक चोर नहीं होता जबतक पकड़ा न जाय
दुश्मनी ले ली तुम्हारे बाप से तो आख़िर क्यों डरेंगे
"कुणाल" सफ़ीना लेकर उतर ही गए भवर में
अब पतवार चलाने से आख़िर क्यों चूकेंगे।।
©किशोर कुणाल