सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

सदियों से ख़ामोश है जो

सदियों से ख़ामोश है जो
उसकी तपस्या क्या समझोगे
मुस्कुराते हुए चेहरे का
तुम दर्द क्या समझोगे
दिल में ख़ामोशी से चुभा है नश्तर जो
उस जख़्म की टिस क्या समझोगे
वख़्त की रेत पर जो ख़त लिखा था "कुणाल"
तुम उस ख़त का मजबुन क्या समझोगे
मैंने सिर्फ लिखा था "एहसास -ए-कुणाल"
तुम अल्फ़ाज भी सिर्फ क्या समझोगे
समझोगे तुम भी किसी रोज़ "कुणाल" को
जब समझोगे समंदर की मिलकियत रखने वाले की एक बूँद प्यास को
जब ज़िन्दगी का फलसफ़ा कभी अधूरा रहेगा
जब रंग किसी तस्वीर में अधूरी देख पाओगें
जब ज़नत और जहन्नुम का फर्क समझोगे
©किशोर कुणाल।।।।

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