सदियों से ख़ामोश है जो
उसकी तपस्या क्या समझोगे
उसकी तपस्या क्या समझोगे
मुस्कुराते हुए चेहरे का
तुम दर्द क्या समझोगे
तुम दर्द क्या समझोगे
दिल में ख़ामोशी से चुभा है नश्तर जो
उस जख़्म की टिस क्या समझोगे
उस जख़्म की टिस क्या समझोगे
वख़्त की रेत पर जो ख़त लिखा था "कुणाल"
तुम उस ख़त का मजबुन क्या समझोगे
तुम उस ख़त का मजबुन क्या समझोगे
मैंने सिर्फ लिखा था "एहसास -ए-कुणाल"
तुम अल्फ़ाज भी सिर्फ क्या समझोगे
तुम अल्फ़ाज भी सिर्फ क्या समझोगे
समझोगे तुम भी किसी रोज़ "कुणाल" को
जब समझोगे समंदर की मिलकियत रखने वाले की एक बूँद प्यास को
जब ज़िन्दगी का फलसफ़ा कभी अधूरा रहेगा
जब रंग किसी तस्वीर में अधूरी देख पाओगें
जब ज़नत और जहन्नुम का फर्क समझोगे
जब समझोगे समंदर की मिलकियत रखने वाले की एक बूँद प्यास को
जब ज़िन्दगी का फलसफ़ा कभी अधूरा रहेगा
जब रंग किसी तस्वीर में अधूरी देख पाओगें
जब ज़नत और जहन्नुम का फर्क समझोगे
©किशोर कुणाल।।।।
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