ज़मीन जिसको मिली नहीं कभी आसमां भी उनको मिला है
हम जैसे काफिरों को भी कभी ख़ुदा मिला है
हम जैसे काफिरों को भी कभी ख़ुदा मिला है
हर सफ़र हर मोड़ पर जिनकों मिले पत्थर
ऐसे मुसाफ़िर को भी कभी शहर मिला है
ऐसे मुसाफ़िर को भी कभी शहर मिला है
इतना रोया हूँ जख़्म ताज़ा रख कर सीने में,
ऐसे आँखों को मुस्कुराहट का भी कभी साथ मिला है
ऐसे आँखों को मुस्कुराहट का भी कभी साथ मिला है
जो कहना है साफ़ कहो शिक़वे हो या शिक़ायत
कब तुम्हारी ख़ामोशी से भी कभी सुकून मिला है
कब तुम्हारी ख़ामोशी से भी कभी सुकून मिला है
कौन भूला है ‘कुणाल’ वो मोहब्बत का फ़रेब, वो हिज्र का दर्द
जागती आँखों से देखें जिसने ख़्वाब उनको भी कभी रात में नींद मिला है ।।
©किशोर कुणाल
जागती आँखों से देखें जिसने ख़्वाब उनको भी कभी रात में नींद मिला है ।।
©किशोर कुणाल
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