सुबह से शाम तक एक एक झूठ बिक जाता है
तुमको समझ नहीं आता की सच्चा भूखा जाता है
तुमको समझ नहीं आता की सच्चा भूखा जाता है
हर रोज जो बस्ता लेकर जाते है सरकारी स्कूलों में खिचड़ी के खातिर
तुमको नज़र नहीं आता की बच्चा फिर भी अनपढ़ कहलाता है
तुमको नज़र नहीं आता की बच्चा फिर भी अनपढ़ कहलाता है
बाप हो तो क्या लिख दोंगे भाग्य बच्चो का अपने हाथ से
तुम पता नहीं करते बच्चा आखिर क्या चाहता है
तुम पता नहीं करते बच्चा आखिर क्या चाहता है
जब घर से निकल परे तो बढ़ते चलो हौसले के साथ
"कुणाल" जानता नहीं कहीं सहरा तो कहीं पर समंदर भी आता है ।।
©किशोर कुणाल
"कुणाल" जानता नहीं कहीं सहरा तो कहीं पर समंदर भी आता है ।।
©किशोर कुणाल
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