सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो
खुद में जो घुट घुट कर मरे मुझ सागर की गंभीरता हो
मैं लहरों की चंचलता हूँ तुम तट की स्थिरता हो
चकोर जिस तृष्णा में बैठे तुम चन्द्रप्रभा की शीतलता हो
जो शब्दों में अपनी दवा ढूँढे तुम मुझ कवी की रचना हो
प्रेम प्रिय प्रियतमा नहीं, मेरे मन आगँन की अल्पना हो
कल्पवृक्ष की सोनजुही, स्वर्ग की पारिजात हो
क्षीर सागर के मंथन से निकली तुम तो अमृतपाश हो
मृत कुमार जीवन में तुम नवविवाहिता प्राण हो
सदासुहागन जीवन में तुम यौवन का उपहार हो
देखो "कुणाल" कवी कल्पित बैठा, तुम तो हर्ष का संचार हो
मेरे सांसो के स्पंदन क्रम को रोकती, तुम वीना की तान हो ||
©किशोर कुणाल

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