सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मैं ज़िगर में खून को गर्म रखता हूँ

मैं ज़िगर में खून को गर्म रखता हूँ
सरेआम सच बोलने का माद्दा भी रखता हूँ
तेरे हर लफ़्ज के हर फर्क को समझता हूँ
तेरे हर लहज़े को मद्देनज़र रखता हूँ
एक नज़र मंदिर पर तो एक नज़र मस्ज़िद पर रखता हूँ
मैं अपने घर में गीता के साथ क़ुरान भी रखता हूँ
दिल में अग़र बग़ावत है तो मोहबत भी रखता हूँ
मैं तेरा दिया हुआ गुलाब आज भी अपनी किताब में रखता हूँ
माना शाहजहाँ नहीं तू इस हिंदुस्तान का "कुणाल",
कोई जान लूटा कर देख एक ताज महल बनाने की हिम्मत भी रखता हूँ।।।
©किशोर कुणाल।।।।

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