"कुणाल" चेहरे के साथ लहज़े याद रखता है
जहाँ नफरत हो वहाँ मुहब्बत की गुंजाइश याद रखता है
जहाँ नफरत हो वहाँ मुहब्बत की गुंजाइश याद रखता है
तफसिया (समझौता) करने बैठे थे जो
पीठ पर लगे ख़ंजर को याद रखता है
पीठ पर लगे ख़ंजर को याद रखता है
सियासती आदमी से बच कर निकलता है
लोमड़ी की प्यारी सी सूरत याद रखता है
लोमड़ी की प्यारी सी सूरत याद रखता है
है बहुत मशले जो सुलझे नहीं अबतक
मुद्दे भी याद रखता है मशला भी याद रखता है
मुद्दे भी याद रखता है मशला भी याद रखता है
मत छेड़ो पुराने ज़ख्मो को भाई
बटवारे की वो शाम याद रखता है
बटवारे की वो शाम याद रखता है
माना सिर्फ बेवफाई नहीं मेरी शायरी की वजह
"कुणाल" तो हरे ज़ख्मो के साथ मुस्कुराहट भी साथ रखता है।।।।
© किशोर कुणाल।।
"कुणाल" तो हरे ज़ख्मो के साथ मुस्कुराहट भी साथ रखता है।।।।
© किशोर कुणाल।।
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