मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

"""मुँह पर तो मुँछे उगा नहीं सके
बाते घर में फुल उगाने की करते हो

आज तक पैजामे का नारा सही ढंग से लगा न सके
बेटा जिन्स पहन कर तुम बहुत इतराते हो

पाव भाजी को बर्गर बना
उलटा सीधा बहुत खाते हो

हाई हैलो कह कर
बङो का पैर छुने में लजाते हो"""

(किशोर कुणाल)

बुधवार, 23 नवंबर 2011

""""किसी की याद में कल रात जो हम सो न सके,

आज दिन के आलम में भी उनके आँखो का नूर हम समेट न सके""""

शनिवार, 19 नवंबर 2011

मेरा स्वाभिमान

"""प्यार दिखाते तो
बर्फ से पानी बन जाता
जरा सा ईज्जत देते तो
जान तक लुटा जाता
माना हिमालय जैसी
हैसियत नहीं मेरी
इसका अर्थ यह नहीं की
कोई तुफान मेरी नीव हिला सके"""

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011


""""किसी का दुखः कितनों का तमाशा बन जाता हैं

अपना सर्वश लुटने के बाद भी उपर सेगाल पर तमाचा लगा जाता है

कितने नंगी आँखे नंगा बना देती है

भरे बजार बजारू बना करछोङती है।""""

( किशोर कुणाल )

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

"""मेरी कलपनाओं का सागर सिमट जाता है कागज के चन्द चिथरों में ।


सारी कहानी बयाँ हो जाती है बस चन्द शब्दों में


भावनाओं की उबाल कैद हो जाती है एक कविता में


पता नहीं क्यों कोई दिल की छोटी सी बात नही समझ पाता नजरों की एक टकराहट में।"""

(किशोर कुणाल)

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

मानव मन

गजब है अजब है,
कुछ तो सोच के परे है,
आकार है निराकार है,
गलत है सही है,
सत्य है असत्य है,
पाप है पूण्य है,

जहाँ देखो वहाँ कई मापदण्ड है,
बेचारा मानस जाये कहाँ,
अपनी शिकायत सुनाये कहाँ,
जिसको मानता है वह तो खुद पत्थर का बन बैठा है,
जिसके अस्तिवत्व पर ही सवाल उठते है,
एक तरफ सामाज और कानून ,
जिसके पास सिर्फ दण्ड का विधान,
और दूसरी तरफ धर्म और विशवास,
जो भय, विशवास, सिद्धांत ,परमपराओं पर, निर्धारण करता है,
मानव मन बहुत फेर मे पङा,
गलत सही के चक्कर में पङा,
जरूरत और सही गलत में फसा......

(किशोर कुणाल)

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

""""कितने तालो का अस्तित्व सिमट जाता है नदियों में,

चन्द नदियाँ अपना सर्वश खो बैठती है सागर में,

बेचारा एक सागर कितने सैलावो को लिए जिन्दा है तुम्हारी आँखों में"""""


(किशोर कुणाल)

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

नटखट

मै थोङा क्रोधी हूँ,
जन्म जात विद्रोही हूँ,
दिल से एक क्रान्तिकारी हूँ,
भला एक मानुष हूँ,
जद्दी बङा यथेच्छाचारी हूँ,
सागर में छुपा अनमोल मोती हँू
अभीमानी नहीं स्वाभीमानी हूँ,
सभल कर थोङा रहीयेगा मुझसे
.
..
...
शैतान नहीं नटखट थोङा अधिक हूँ ।

( किशोर कुणाल )

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

मेरी खुशी

मैं बहुत खोजता हूँ,
हर तरफ खोजता हँू ,
दसो दिशाओ में ,
अपनो मे परायों में ,
परिचितों में अपरिचितो में ,
यत्र ,तत्र, सवत्र,
हर सम्भव प्रयास करता हूँ,
अब तो समझौता करना भी सिख लिया हूँ ,
उसके जरूरतों के अनुसार चलता हूँ ,
फिर भी नहीं मिलती,
पता नही क्यों ?.
..
...
सफलता भरी मेरी एक खुशी ........................

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

50 के बाद भी लङता हँू

सारी उम्र लगा दी बस एक पहचान के खातीर,

बच्चो के सर पर एक छत के खातीर,

हर समझौता सिर्फ अपनो के खातीर,

क्या करता,

आज तक आसानी से कुछ मिला नहीं,

घंटो के सघंर्षो के बाद भी पल भर के सुख का ठिकाना नहीं,

बच्चो की आँखो में अपनी खुशी खोजता हूँ,

उनके भविषय के खातीर 50 के बाद भी लङता हूँ,

(किशोर कुणाल)

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

पंच तत्व प्रवीन,

मै हुँ महा महीम,

विश्वास के रथ पर सवार हुँ,

ज्ञान  का अस्त्र  रखता हुँ साथ,

रण भूमि  का रणवीर हुँ,

कुरुक्षेत्र  का कृष्ण,

चचंलता है प्रकृति  मेरी,

शांति  का आचरण है,

पंच तत्व से प्रवीन,

विश्वास  के रथ पर सवार,

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

सपूत

"""मुझे अपनी किसमत इतिहास के पन्नो पर कुछ ऐसी अदा से लिखना है कि,

हिन्दुस्तान की प्रत्येक माँ चाहे मुझे तुझ जैसा ही सपूत जन्म देना है"""

(किशोर कुणाल)

शनिवार, 17 सितंबर 2011

"" तिज़ारत ""

""""हमने ज़रा सा झटका क्या दिया तो तुम्हे धोखे का एहसास हो रहा है,
तुमने जो ताज़िनदगी हमे ज़ो तिज़ारत दिखायी उसका क्या???"""""

(किशोर कुणाल)

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

प्रेम के प्रति एक दृष्टिकोण

कभी कभी किसी अपरिचित का विचार आपके दृष्टिकोण को बहुत प्रभावशाली तरिके से बदल देते है। हमारे मानसिकता में प्रेम की जो सहज परिभाषा होती है पहली नजर वाली जैसा फिल्मो में दिखाते है सच मानीयें प्रेम की वास्तविक परिभाषा काफी विस्तृत होती है ।प्रेम दो प्राणियों के मध्य वह मानसिक आैर आत्मिक क्रिया है जो आकर्षण से प्रारम्भ होकर समर्पण पर से अस्तित्व में आती है और अंनत तक चलती हैँ।जिसमें कई स्तरो का समावेश होता है। जिसमें आकर्षण के साथ साथ विश्वास, मित्रता , आपसी सहनशीलता तथा अंत मे समर्पन जो अत्यंत महत्वपूर्ण है का समावेश होता है।मानव आकषर्ण से प्रराम्भ होकर विशवास के राह पर चल कर मित्रता के मोड़ से आपसी सहनशीलता रखते हुए समर्पण की सीढी पर चढता है और प्रेम को प्राप्त कर जीवन के सफर में आगे बढते है। यही है वास्तविक प्रेम है जैसा राधा कृषण का था। एक बार की बात है राधा जी कृष्ण जी से पूछती है हे नाथ आपने प्रेम मेरे साथ और व्यवहार अर्थात विवाह रूपमणी के साथ यह अन्याय मेरे साथ क्यों किया ?
कृष्ण जी बड़ी रोचक और सुंदर तरह इसका जबाब दिया उन्होने कहा राधा व्यवहार दो लोगो के मध्य किया जाता है लेकिन हम दोनो तो एक ही है न।

( किशोर कुणाल )

रविवार, 11 सितंबर 2011

"""मैं दिन मे सपने देखने लगा हूँ"""

आज कल रात में नीद नहीं विचार आते है,
सपनो की जगह पर खयाल आते है,
शतरंज की बिसात पर मंत्री बन बैठा हूँ,
अपनी बागडोर भविष्य के हाथ रख छोड़ा हूँ,
पता नहीं क्यों,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ,
खूद अपने आप से लड़ने लगा हूँ,
अपना ही प्रतिव्दन्दी बन बैठा हूँ,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ,
मै दिन में सपने देखने लगा हूँ!!!

(किशोर कुणाल)

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

मेरी समस्या

मेरी समस्या बहुत पूरानी है
यह न तो कथा और न कहानी है
कोई बड़ी बात नहीं बस हम तुम की एक छोटी सी जिन्दगानी है
दुख सुख के पल है इसमें
पता नहीं साथ मे थोड़ी प्ेरम कहानी भी है
भावनाओं की उड़ान है इसमें
कुछ अनचाही कुछ अनकही बाते हैं इसमें
यह बात कुछ पूरानी है मेरी समस्या बहुत पूरानी है एक छोटी सी मुलाकात थी किसी से
न ही कोई पूर्व पहचान थी
चिलचलाती धूप बड़ी थी गर्मी की बह दोपहर थी
भीड़ मे मै अकेला था वह अकेली थी
पता नहीं कुछ बात थी
मैं यही सोच रहा था इतने में उसने टोक दिया
मदद की वह गुहार थी
मैं असहज सा और थोड़ा घबराया
पता नहीं क्या बात थी
शायद यह पहली मुलाकात थी
उसने कुछ ऐसा कहा की जो अनकही बात थी
मै कुछ सकपकाया तथा सोच मे पड़ा
फिर देखा सभ्य तथा शिक्षत वह कन्या थी
उसकी समस्या को सुलझाया मैने
जो एक छोटी सी बात थी
बड़े सभ्य तरीके से धन्यवाद कहा उसने
फिर कुछ ऐसा पूछा उसने जो मेरे लिए चौकने वाली बात थी
जो जीवन मे पहली ऐसी परिस्थिती थी
मेरे उत्रर का कुछ देर इन्तेजार के बाद मुस्कुराहट से मेरा धन्यवाद दूसरी बार चुकाने बाद वह चली गयी
उसकी मुस्कुराहट में कुछ तो बात थी
शब्दहीन खड़ा उसके प्रशन का उत्रर ढूढता कुछ देर वही पर खड़ा मैं फिर अपने मंजिल को चला
यह कहानी कुछ पुरानी थी
हम तुम से भरी एक छोटी सी जिन्दगानी थी
मेरी समस्या बहुत पुरानी थी
भुड़सत के पल में यही सोचता हूँ
शब्दहीन खड़ा न रह कर उसके प्रशन का जबाब देता
मै कम से कम उसका फोन न0 तो लेता मैं
शायद बाद में ही जबाब देता
यही एक मेरी एकाकी थी
हम तुम की एक छोटी सी कहानी थी
मेरी समस्या बहुत पूरानी थी
मेरी समस्या बहुत पूरानी थी

बुधवार, 7 सितंबर 2011

हमारा देश अब कायर दिखता है

हमारा देश अब कायर दिखता है,
कड़ोरो की भीड़ अपनो की मौत का बेशर्म तमाशा देखता है,

अब बम धमाके बस HEAD LINE बन चुके है,
अपनी कायरता के प्रमाण पत्र बन चुके है,
संसद से लेकर हाई कोट तक नाक बची कहा है,
लगता है सरकार को अब तक लज्जा आयी कहा है,

वो तो नामर्दो की टोली है,
जो भीड़ पर वार करती है,
हम तो सबल है,
फिर क्यों अब तक कसाब को पाले बैठे है,
क्या पौरूष को हमने खो दिया है,
जलालत की जिन्दगी को अपना लिया है।
(किशोर कुणाल)

रविवार, 4 सितंबर 2011

जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण

जीवन मे कुछ परिस्थितिया ऐसी होती है जिसमे  आदमी अपने आप को पहचानता है अपना दिशा  निर्धारण  करता है अपनी प्रकृति से समझौता कर अपनी प्रकृति में  भी परिवर्तन लाता है अपनी बुध्दि से विवेक  का निर्माण  करता है।हर कोई जीवन को अपने अनुसार समझता है उसे परिभासित करता है जहाँ तक मेरा प्रशन मै इसे वह सड़क मानता हूँ जिसमे  कई मोड है साथ मे speed breaker भी चाहे जीतनी  धीरे से जाओ झटका लगना ही है।उपर से एक यथेच्छाचारी होने की भी कीमत  चुकानी पड़ती है। कभी कभी शासन की इच्छा अनुशासन भुला देती है।भौतिकी का एक सिधांत  है प्रत्येक तत्व की क्रिया  प्रतिक्रिया   विश्व के हर तत्व से जुड़ा होता है जैसे कही एक तितली  का फरफराना विश्व  के दूसरे कोने मे तुफान की वजह बन सकती है।जीवन पर भी यह सिधांत  सही बैठता है।किसी  अपरिचित का छोटा सा कदम भी किसी  के सफलता असफलता की वजह बन सकती है। इसी तरह अपना एक डर दूसरे को बलवान बनाने के लिए  काफी होता है।

(किशोर  कुणाल)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

"""मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया """

आलोचनाओ ने जीवन के दूसरे पहलू से जो मेरा पहचान करवाया,


परिस्थितिथयों ने जो मेरे स्वाभिमान  को कितना चोट पहुँचाया,


प्रत्येक  चोट ने दर्द बयां करने की अदा सीखा दिया ,


मुझे बातो की कलाकारी में  प्रवीण बना दिया ,


पंगा लेने की प्रबल इच्छा ने भी,

मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया


मुझे ""अधिवक्ता"" बना दिया ....!


(किशोर  कुणाल)

बुधवार, 31 अगस्त 2011

मित्र

कृष्ण और सुदामा के संबध पर जब विचार किया,


सच कहता हूँ मित्र तुम्हारा ही ध्यान किया,नीति


निर्धारण में मैने तुम्हारा साथ पाया,


तन धन से उपर मन का मिलाप पाया,


मित्र हमारे मध्य,


मत भेद तो आया,


लेकिन मन का भेद कभी नहीं आया,


कलयुग में हम भाई जैसा संबध रखते है,


रक्त संबध से सर्वोच्य िवश्वास को स्थान देते है,


मित्र सुख और दुख में हम तुमही को याद करते है,


विश्वास है मुझे,

इस विश्वास के पवित्र बंधन का तुम ख्याल रखोगें,

इस मित्रता के संबध को बहुत ईमानदारी के साथ आगे भी निभाओगें ।
(िकशोर कुणाल)

संस्कारो की नीव

""""आज हमारे संस्कारो की नीव  कमजोर होती जा रही है,
तन पर कपङो के साथ लज्जा कम होती जा रही है,
आज टी. वी देखते समय  बाबु जी के सामने नजर नीची नहीं होती,
गलती से भी चैनल चंेज नहीं होती""""

(िकशोर कुणाल)

सपने के वास्ते

ठान लिया है मैनें सिकंदर की तरह जीने को,

सपने के वास्ते हर संग्राम लड़ने को,

हवन कुण्ड की अग्िन,

अब मुझसे आहुति माँगती है,

इस कलयुग में अश्वमेघ यञ चाहती है,

रक्तपात की इक्छा नहीं,

बस दिलों पर अधिकार चाहिए ,

लोकतंत्र के इस युग मे कलम की तलवार चाहिए,


मेरी कलम की वार बड़ी अनोखी है,


काया पर नहीं आत्मा पर वार करती है,


इतनी स्वाधीन है इतनी शक्ितशाली है,


जो अधिकार पाना और दिलाना भी जानती हैं!

(िकशोर कुणाल)

सोमवार, 29 अगस्त 2011

जन्म दिवस

आज दिवस बहुत खास है जीवन में बहुत उल्लास है


हर तरफ सुन्दर जिन्दगी की बहार है


एक चन्चल जिन्दगी समीप आ कहती है मुझसे

""जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएँ कुणाल जी""आपका जन्मदिन आज है

यह सून मेरे चेहरे की रौनक आ गई,

उसकी आँखों मे अपनी अहमीयत देख मुझमे मे आत्म विश्वास आ गई

भादों में सावन की मस्ती छा गई।""

( किशोर कुणाल )

शनिवार, 27 अगस्त 2011

अकेला

चलता हूँ अकेला

सीने में आग ले कर

खुद को ,कोध की ज्वाला में तपाकर

दिशा  हीन दिखता  हूँ

ठोकर खा करके

भी आसंमा को देखता हँू

अपने को आजमाना चाहता हूँ

वख्त का साथ खोजता हँू

भविष्य  के लिए  आज से संघर्ष करता हूँ


बस मौके की तलाश है जानता हूँ मिलेगा


मेरा वखत् भी आएगा

हँसने दो दुनिया  को ऐसा कुछ कर जाँउगा

ईश्या से उनका सीना  जला जाँउगा

फिर देखूगा फिर   दिखाउँगा    

जीत के जशन  में डूब जाउँगा

दुनिया  को एक राह दिखाउँगा

अकेला ही चला जाँउगा
अकेला ही चला जाँउगा

(किशोर कुणाल)

मैं

मैं कोई शीशा नही

जो जरा सा चोट लगी और बिखर गए

मैं कोई बादल भी नहीं

जिसकी हवा के रूख से मंजिल तय हो

मैं कोई पत्थर नहीं

जिसे हर नदी भेद डाले

मैं कोई चाँद नहीं

जिसकी जिंदगी किस्तो मे हो

मैं वह िहमालय हँू

जो अपनी पूरी बुंलदी पर है


मै वह नदी हँू

जिसे मंजिल की चिन्ता नही

मै वह सागर हँू

जिसकी सीमा का आकलन नहीं

मै वह सूरज हूँ जो अपनी ही ज्वाला से अनभिञ हूंँ

(किशोर कुणाल)

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

जिन्दगी के पन्ने

कभी सोचता हूँजिन्दगी के कुछ पन्ने खुद लिख पाता
अपनी ही जिन्दगी को खुद समझ पाता
अपने जिन्दगी में कुछ चटपटे ,मनचाहे लम्हे जोर पाता
पता नहीं जिन्दगी में कुछ मजा नहीं
पानी पूरी की तरह चटपटा नहीं
काश ! जिन्दगी का स्वाद मैं कुछ बदल पाता
जिन्दगी के कुछ पन्ने खुद लिख पाता
दुखी नहीं हूँ पर कुछ िखन्न हूँ
भविष्य के लिए अाज से असंतुष्ट हूँ
पता नहीं बहुत साधारण जिन्दगी है
इसमें तो कुछ भी फिल्मी नहीं है
काश! मेरी भी कहानी कुछ तो फिल्मी होती
गजनी सी नहीं लेिकन रब ने बना दी जोङी तो होती
काश! मेरी जिन्दगी कुछ तो फिल्मी होती 8 पैक नहीं तो 6 पैक तो होती
किसी नायिका का मै तो नायक होता
काश! जिन्दगी के कुछ पन्ने मै खुद िलख पाता
चंद लम्हें ईशवर से माँगकर सजाता
जिन्दगी के कुछ पन्ने मै खुद लिख पाता
(किशोर कुणाल)...

बुधवार, 24 अगस्त 2011

भावनाओ की चिता

"""मेरी भावनाओं की चिता मत जलाओ

कभी तो मेरी नजरों का मुसकुराहट से ही जवाव तो देते जाओ

आज मैं मुसफिर हूँ
तेरी राहों का जिसकी मंजिल तूझमें दिखती हैं

मन की उमगों को रोकना अब मेरे बस में नहीं

क्योकि अब तो यह आलम है कि हर सांस तेरी मांग करती है"""
( किशोर कुणाल )