मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

कुछ खट्टे मिट्ठे एहसासों के साथ आज  वकालत के एक साल पुरे,
सोच में आमूल तो नहीं पर कुछ परिवर्तन तो हुए है,
अनुभवों की सौगात मिली है ,
हकीकत से पहचान बढ़ी  है,
जिंदगी में बात कुछ खास बनी है,,,,
(किशोर कुणाल )

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

सरजमी


.पाप पूण्य  ,सत्य असत्य गलत सही से परे एक बस्ती है ,
 जँहा  इंसानी और रूहानी  ज़रूरत ही पूरी होती है ,
जँहा एक समान  हवा और पानी रौशनी और ज़मींन है ,
जँहा  कुदरत कोई ना इंसाफी नहीं करता है,
किसी का माकन दुसरे कसे उची नहीं है 
अहम्  गुरुर घमंड की जँहा मौत हो चुकी है,
बस चंद पाक इंसानी ज़ज्बातो का ही सरमाया ,
जँहा खूबसूरती चेहरों में नहीं निगाहों में है,
विश्वाश किसी ताले की मोहताज नहीं है ,
जँहा मज़हब की बात नहीं हुआ करती ,
जँहा सिर्फ मोहबत की खेती हुआ करती है,
मै  अब तक उस  सर जमी के इन्तेजार में  हु ..... .. 
© किशोर कुणाल .............

रविवार, 2 दिसंबर 2012

शब्द ------


कुणाल तुम सिर्फ एक शब्द बन गए हो .. 
सिर्फ चंद अक्षरों की जोड़ तोड़ से बना एक नाम .. 
संबोधन का मात्र एक माध्यम.. 
सुन कर भी किसी के दिल में न तो आग लगती है ..
और न ही गर्व से सीना फुल जाता है और न ही दिलो में जलन होती है किसी को
न ही किसी को कुछ जजबा जगता है
नहीं मुस्कराहट आती है हा ही आसू गिरते है
कुछ तो ऐसा करो
एक परिचय बनो
कुछ अरमानो के , कुछ सपनो के,कुछ ज़ज्बातो के कही इतिहास की गहरे में खो न जाऊ।।।
(किशोर कुणाल)