रविवार, 24 सितंबर 2017

ज़हर की शीशी में मैं दवा ख़ास रखता हूँ

ज़हर की शीशी में मैं दवा ख़ास रखता हूँ
मालूम नहीं क्यों ऐसे ख्यालात रखता हूँ
अपने कमरे में अंधेरा कुछ ख़ास रखता हूँ
अंदर की रौशनी की जो तलाश रखता हूँ
मुझकों मालूम नही ये घर क्यों खाली है मेरा
इसलिए दरों दीवार को चमकदार रखता हूँ
ख़ुद से इन्तेक़ाम का हर समान रखता हूँ "कुणाल"
इसलिए कागज़ क़लम दवात अपने पास रखता हूँ।।।
"©किशोर कुणाल

सब समझ लेती हो मग़र जज़्बात नहीं समझती

सब समझ लेती हो मग़र जज़्बात नहीं समझती
तुम खुदगर्ज़ हो कि मेरे हालात नहीं समझती
में ऐसा कभी नहीं था जो हुआ हूँ अभी
तुम मेरे जख्मों का ईलाज नहीं समझती
मन तो करता है कि लगा दूँ दुनिया में आग
तुम मेरे दिल के अँगार नहीं समझती
तुम नहीं जाती तो ऐसा कभी नहीं होता
तुम बेवफ़ा हो जो इश्क़ के इम्तिहाँ नहीं समझती
स्कूल में मिली थी मुझकों वो कॉलेज में मिल कर खो गयी
दिन तो समझ चुकि थी मेरी मग़र मेरी रात नहीं समझती
मेरे कुछ सवालात है जो मरने से पहले पूछ ही लूँगा तुमसे
मेरे अंदाज को समझती हो न मग़र इन्तेक़ाम नहीं समझती
सब कुछ लिहाज़ के दायरे में ही रहे तो ही अच्छा है
तुम साँसे समझ लेती थी मग़र सैलाब नहीं समझती
शायरी तो समझ लेती हो तुम मग़र शायर को नहीं समझती
अल्फ़ाज तो समझ लेती हो तुम मग़र जज़्बात नहीं समझती।।।।
©किशोर कुणाल

अपने तकलीफ़ का ईलाज क्या करता

अपने तकलीफ़ का ईलाज क्या करता
मैं शायरी न करता तो क्या करता??
दुनिया पूँछती है और पूँछेगी ही
मैं इतने सवाल न करता तो क्या करता??
ख़ुद ही ख़ुद का ईलाज नहीं हो पाया मुझसे
मैं इन्तेक़ाम न लेता तो क्या करता ???
ईबादत मुझसे हो ही नहीं पायी कभी
मैं इश्क़ न करता तो क्या करता????
क़यामत आएगी तो पूछूँगा अपने क़ातिल से "कुणाल"
तू अगर क़त्ल न करता तो क्या करता ????
©किशोर कुणाल

हिन्दु हूँ मैं

अग्नि में अर्पित हूँ गंगा में तर्पित हूँ
हिन्दु हूँ मैं
अपनी मिट्टी के लिए समर्पित हूँ
आसमान में जलकर मैं
राख बन मिट्टी में मिलता हूँ
गंगा में बहकर मैं सौंधी सौंधी महकता हूँ
कहने को साकार है पर सब कुछ निराकार है
पत्तों से लेकर पर्वत तक का सबका सम्मान है
©किशोर कुणाल

साफ़ दिल का जल्दी कोई शख़्श नहीं मिलता

साफ़ दिल का जल्दी कोई शख़्श नहीं मिलता
जात का मिल भी जाय मगर जज्बात का नहीं मिलता 
मैं शुद्ध शहद हूँ साहब मुझसा मीठा तो बाजार में नहीं मिलता 
खोजना है तो खोज लो "कुणाल" कुछ मर्ज का इलाज़ तो दवाओं में भी नहीं मिलता।।।
©किशोर कुणाल

मेरी आँखों पर जैसे कोई तिलस्म जैसा

मेरी आँखों पर जैसे कोई तिलस्म जैसा
सुबह की शबनम की बूंद जैसा
मानों तो कोई आफ़ताब जैसा
रात का इकलौता महताब जैसा
सूरों में मचलती हुई रागिनी जैसा
रात में चमकती हुई दामिनी जैसा
तसव्वुर जैसा तस्वीर जैसा
ख्वाब जैसा, ताबीर जैसा
कोई नगमा जैसा किसी नज़्म जैसा
कोई ग़ज़ल जैसा किसी खुशबु जैसा
मेरी बनायी हुई अनदेखी तस्वीर जैसा
कभी लिखी थी जो वो अनसुनी ग़ज़ल जैसा
लफ्ज़ ख़त्म हो जाएं ऐसी तारीफ़ जैसा
©किशोर कुणाल
तिलस्म-जादू ,शबनम- ओस की बूंद, आफ़ताब- सूरज, महताब- चाँद, दामिनी- बिजली,

तुझसे बिछड़ कर तेरे वजूद का हिस्सा लिखता हूँ

तुझसे बिछड़ कर तेरे वजूद का हिस्सा लिखता हूँ
कुछ तो है तेरा मुझमें कि मैं एक ग़ज़ल लिखता हूँ
जिसकी एक बूंद भी इंसान की जान ले लेती हो
सुनने वाले कहते है उस ज़हर से मीठा लिखता हूँ
न कभी तलवार न तो कभी खंजर चलायीं मैने
फ़िर भी क्यों तेरी नज़रों की धार लिखता हूँ
सांसो का भी क्या कोई ठौर ठिकाना है क्या
इसलिए मरने पहले मैं ताज़महल लिखता हूँ
कभी आँख से गिरी बूँद को शबनम कहाँ था मैंने
फिर क्यों आज तेरी निग़ाह को शराब लिखता हूँ
अब कहने वाले जो भी कहें मुझकों
बंदगी में हर लफ़्ज तेरे नाम लिखता हूँ
न कभी क़त्ल किया न तो किसी का क़त्ल देखा "कुणाल"
अब तूही समझ क्यों तुझे हर ग़ज़ल में क़ातिल लिखता हूँ ।।
®©किशोर कुणाल