तुझसे बिछड़ कर तेरे वजूद का हिस्सा लिखता हूँ
कुछ तो है तेरा मुझमें कि मैं एक ग़ज़ल लिखता हूँ
कुछ तो है तेरा मुझमें कि मैं एक ग़ज़ल लिखता हूँ
जिसकी एक बूंद भी इंसान की जान ले लेती हो
सुनने वाले कहते है उस ज़हर से मीठा लिखता हूँ
सुनने वाले कहते है उस ज़हर से मीठा लिखता हूँ
न कभी तलवार न तो कभी खंजर चलायीं मैने
फ़िर भी क्यों तेरी नज़रों की धार लिखता हूँ
फ़िर भी क्यों तेरी नज़रों की धार लिखता हूँ
सांसो का भी क्या कोई ठौर ठिकाना है क्या
इसलिए मरने पहले मैं ताज़महल लिखता हूँ
इसलिए मरने पहले मैं ताज़महल लिखता हूँ
कभी आँख से गिरी बूँद को शबनम कहाँ था मैंने
फिर क्यों आज तेरी निग़ाह को शराब लिखता हूँ
फिर क्यों आज तेरी निग़ाह को शराब लिखता हूँ
अब कहने वाले जो भी कहें मुझकों
बंदगी में हर लफ़्ज तेरे नाम लिखता हूँ
बंदगी में हर लफ़्ज तेरे नाम लिखता हूँ
न कभी क़त्ल किया न तो किसी का क़त्ल देखा "कुणाल"
अब तूही समझ क्यों तुझे हर ग़ज़ल में क़ातिल लिखता हूँ ।।
®©किशोर कुणाल
अब तूही समझ क्यों तुझे हर ग़ज़ल में क़ातिल लिखता हूँ ।।
®©किशोर कुणाल
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