रविवार, 24 सितंबर 2017

मेरी आँखों पर जैसे कोई तिलस्म जैसा

मेरी आँखों पर जैसे कोई तिलस्म जैसा
सुबह की शबनम की बूंद जैसा
मानों तो कोई आफ़ताब जैसा
रात का इकलौता महताब जैसा
सूरों में मचलती हुई रागिनी जैसा
रात में चमकती हुई दामिनी जैसा
तसव्वुर जैसा तस्वीर जैसा
ख्वाब जैसा, ताबीर जैसा
कोई नगमा जैसा किसी नज़्म जैसा
कोई ग़ज़ल जैसा किसी खुशबु जैसा
मेरी बनायी हुई अनदेखी तस्वीर जैसा
कभी लिखी थी जो वो अनसुनी ग़ज़ल जैसा
लफ्ज़ ख़त्म हो जाएं ऐसी तारीफ़ जैसा
©किशोर कुणाल
तिलस्म-जादू ,शबनम- ओस की बूंद, आफ़ताब- सूरज, महताब- चाँद, दामिनी- बिजली,

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