रविवार, 24 सितंबर 2017

सब समझ लेती हो मग़र जज़्बात नहीं समझती

सब समझ लेती हो मग़र जज़्बात नहीं समझती
तुम खुदगर्ज़ हो कि मेरे हालात नहीं समझती
में ऐसा कभी नहीं था जो हुआ हूँ अभी
तुम मेरे जख्मों का ईलाज नहीं समझती
मन तो करता है कि लगा दूँ दुनिया में आग
तुम मेरे दिल के अँगार नहीं समझती
तुम नहीं जाती तो ऐसा कभी नहीं होता
तुम बेवफ़ा हो जो इश्क़ के इम्तिहाँ नहीं समझती
स्कूल में मिली थी मुझकों वो कॉलेज में मिल कर खो गयी
दिन तो समझ चुकि थी मेरी मग़र मेरी रात नहीं समझती
मेरे कुछ सवालात है जो मरने से पहले पूछ ही लूँगा तुमसे
मेरे अंदाज को समझती हो न मग़र इन्तेक़ाम नहीं समझती
सब कुछ लिहाज़ के दायरे में ही रहे तो ही अच्छा है
तुम साँसे समझ लेती थी मग़र सैलाब नहीं समझती
शायरी तो समझ लेती हो तुम मग़र शायर को नहीं समझती
अल्फ़ाज तो समझ लेती हो तुम मग़र जज़्बात नहीं समझती।।।।
©किशोर कुणाल

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