गुरुवार, 25 अगस्त 2011

जिन्दगी के पन्ने

कभी सोचता हूँजिन्दगी के कुछ पन्ने खुद लिख पाता
अपनी ही जिन्दगी को खुद समझ पाता
अपने जिन्दगी में कुछ चटपटे ,मनचाहे लम्हे जोर पाता
पता नहीं जिन्दगी में कुछ मजा नहीं
पानी पूरी की तरह चटपटा नहीं
काश ! जिन्दगी का स्वाद मैं कुछ बदल पाता
जिन्दगी के कुछ पन्ने खुद लिख पाता
दुखी नहीं हूँ पर कुछ िखन्न हूँ
भविष्य के लिए अाज से असंतुष्ट हूँ
पता नहीं बहुत साधारण जिन्दगी है
इसमें तो कुछ भी फिल्मी नहीं है
काश! मेरी भी कहानी कुछ तो फिल्मी होती
गजनी सी नहीं लेिकन रब ने बना दी जोङी तो होती
काश! मेरी जिन्दगी कुछ तो फिल्मी होती 8 पैक नहीं तो 6 पैक तो होती
किसी नायिका का मै तो नायक होता
काश! जिन्दगी के कुछ पन्ने मै खुद िलख पाता
चंद लम्हें ईशवर से माँगकर सजाता
जिन्दगी के कुछ पन्ने मै खुद लिख पाता
(किशोर कुणाल)...

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