ठान लिया है मैनें सिकंदर की तरह जीने को,
सपने के वास्ते हर संग्राम लड़ने को,
हवन कुण्ड की अग्िन,
अब मुझसे आहुति माँगती है,
इस कलयुग में अश्वमेघ यञ चाहती है,
रक्तपात की इक्छा नहीं,
बस दिलों पर अधिकार चाहिए ,
लोकतंत्र के इस युग मे कलम की तलवार चाहिए,
मेरी कलम की वार बड़ी अनोखी है,
काया पर नहीं आत्मा पर वार करती है,
इतनी स्वाधीन है इतनी शक्ितशाली है,
जो अधिकार पाना और दिलाना भी जानती हैं!
(िकशोर कुणाल)
सपने के वास्ते हर संग्राम लड़ने को,
हवन कुण्ड की अग्िन,
अब मुझसे आहुति माँगती है,
इस कलयुग में अश्वमेघ यञ चाहती है,
रक्तपात की इक्छा नहीं,
बस दिलों पर अधिकार चाहिए ,
लोकतंत्र के इस युग मे कलम की तलवार चाहिए,
मेरी कलम की वार बड़ी अनोखी है,
काया पर नहीं आत्मा पर वार करती है,
इतनी स्वाधीन है इतनी शक्ितशाली है,
जो अधिकार पाना और दिलाना भी जानती हैं!
(िकशोर कुणाल)
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