मैं कोई शीशा नही
जो जरा सा चोट लगी और बिखर गए
मैं कोई बादल भी नहीं
जिसकी हवा के रूख से मंजिल तय हो
मैं कोई पत्थर नहीं
जिसे हर नदी भेद डाले
मैं कोई चाँद नहीं
जिसकी जिंदगी किस्तो मे हो
मैं वह िहमालय हँू
जो अपनी पूरी बुंलदी पर है
मै वह नदी हँू
जिसे मंजिल की चिन्ता नही
मै वह सागर हँू
जिसकी सीमा का आकलन नहीं
मै वह सूरज हूँ जो अपनी ही ज्वाला से अनभिञ हूंँ
(किशोर कुणाल)
जो जरा सा चोट लगी और बिखर गए
मैं कोई बादल भी नहीं
जिसकी हवा के रूख से मंजिल तय हो
मैं कोई पत्थर नहीं
जिसे हर नदी भेद डाले
मैं कोई चाँद नहीं
जिसकी जिंदगी किस्तो मे हो
मैं वह िहमालय हँू
जो अपनी पूरी बुंलदी पर है
मै वह नदी हँू
जिसे मंजिल की चिन्ता नही
मै वह सागर हँू
जिसकी सीमा का आकलन नहीं
मै वह सूरज हूँ जो अपनी ही ज्वाला से अनभिञ हूंँ
(किशोर कुणाल)
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