शनिवार, 27 अगस्त 2011

मैं

मैं कोई शीशा नही

जो जरा सा चोट लगी और बिखर गए

मैं कोई बादल भी नहीं

जिसकी हवा के रूख से मंजिल तय हो

मैं कोई पत्थर नहीं

जिसे हर नदी भेद डाले

मैं कोई चाँद नहीं

जिसकी जिंदगी किस्तो मे हो

मैं वह िहमालय हँू

जो अपनी पूरी बुंलदी पर है


मै वह नदी हँू

जिसे मंजिल की चिन्ता नही

मै वह सागर हँू

जिसकी सीमा का आकलन नहीं

मै वह सूरज हूँ जो अपनी ही ज्वाला से अनभिञ हूंँ

(किशोर कुणाल)

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