कभी कभी किसी अपरिचित का विचार आपके दृष्टिकोण को बहुत प्रभावशाली तरिके से बदल देते है। हमारे मानसिकता में प्रेम की जो सहज परिभाषा होती है पहली नजर वाली जैसा फिल्मो में दिखाते है सच मानीयें प्रेम की वास्तविक परिभाषा काफी विस्तृत होती है ।प्रेम दो प्राणियों के मध्य वह मानसिक आैर आत्मिक क्रिया है जो आकर्षण से प्रारम्भ होकर समर्पण पर से अस्तित्व में आती है और अंनत तक चलती हैँ।जिसमें कई स्तरो का समावेश होता है। जिसमें आकर्षण के साथ साथ विश्वास, मित्रता , आपसी सहनशीलता तथा अंत मे समर्पन जो अत्यंत महत्वपूर्ण है का समावेश होता है।मानव आकषर्ण से प्रराम्भ होकर विशवास के राह पर चल कर मित्रता के मोड़ से आपसी सहनशीलता रखते हुए समर्पण की सीढी पर चढता है और प्रेम को प्राप्त कर जीवन के सफर में आगे बढते है। यही है वास्तविक प्रेम है जैसा राधा कृषण का था। एक बार की बात है राधा जी कृष्ण जी से पूछती है हे नाथ आपने प्रेम मेरे साथ और व्यवहार अर्थात विवाह रूपमणी के साथ यह अन्याय मेरे साथ क्यों किया ?
कृष्ण जी बड़ी रोचक और सुंदर तरह इसका जबाब दिया उन्होने कहा राधा व्यवहार दो लोगो के मध्य किया जाता है लेकिन हम दोनो तो एक ही है न।
( किशोर कुणाल )
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