शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

""""कितने तालो का अस्तित्व सिमट जाता है नदियों में,

चन्द नदियाँ अपना सर्वश खो बैठती है सागर में,

बेचारा एक सागर कितने सैलावो को लिए जिन्दा है तुम्हारी आँखों में"""""


(किशोर कुणाल)

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