जिस्म से ज़मीर तक का ख़ुलासा चाहती थी
वो मेरे वजूद का हिस्सा चाहती थी
वो मेरे वजूद का हिस्सा चाहती थी
मैं इनकार तो वो इज़हार चाहती थी
कुछ ज़ख्मो की वह दवा चाहती थी
कुछ ज़ख्मो की वह दवा चाहती थी
आज ये रात भी क्या खता कर गयी "कुणाल"
मेरे हिस्से में आने वाली पूर्णिमा चाहती थी
मेरे हिस्से में आने वाली पूर्णिमा चाहती थी
मैं तनहाई की चादर ओढ़े सिसक रहा सर्दी में
वो मौसम की पहली बरसात में छाता चाहती थी
वो मौसम की पहली बरसात में छाता चाहती थी
खुदगर्ज़ी में ये कैसा सितम कर दिया "कुणाल"
वो दो क़दम ही चलने वाला सिर्फ़ दोस्त चाहती थी
वो दो क़दम ही चलने वाला सिर्फ़ दोस्त चाहती थी
ख़ामोशी से गिर गयी जो ख्वाइशों की इमारत "कुणाल"
वो तो अब हर तालुकात मुझसे ख़त्म चाहती थी
सुनसान सड़क पर वो अपना मकान अलग चाहती थी।।।
© किशोर कुणाल।।
वो तो अब हर तालुकात मुझसे ख़त्म चाहती थी
सुनसान सड़क पर वो अपना मकान अलग चाहती थी।।।
© किशोर कुणाल।।
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