छोटी छोटी बात पर कुछ अकड़ जाते हो
इतना लड़ती हो मुझसे की बिखर जाते हो
इतना लड़ती हो मुझसे की बिखर जाते हो
ज़िंदगी अकड़ गयी है दिसंबर की सर्दी में
और तुम हो कि मुझमे यूँ पिघल जाते हो
और तुम हो कि मुझमे यूँ पिघल जाते हो
देखों संसद का शीतकालीन सत्र भी ख़त्म हो चूका
मैं सत्ता सा चुप और तुम विपक्ष सा भड़क जाते हो
मैं सत्ता सा चुप और तुम विपक्ष सा भड़क जाते हो
अभी बेवफ़ाई का लगता है कि मौसम आया
तुम कैसे मेरे बग़ीचे से गुलाब तोड़ के जाते हो
तुम कैसे मेरे बग़ीचे से गुलाब तोड़ के जाते हो
ये मेरी सराफत है कि मैं चुप हूँ ज़ालिम
मुझ वकील पर तुम जज की तरह सितम ढाते हो
मुझ वकील पर तुम जज की तरह सितम ढाते हो
वक़ालत के दाँव पेंच में फंसा एक वकील "कुणाल"
तुम हो कि वफ़ा का फ़लसफ़ा सुना कर जाते हो
तुम हो कि वफ़ा का फ़लसफ़ा सुना कर जाते हो
©किशोर कुणाल
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