हर लफ़्ज हर अल्फ़ाज में लिख जाता हूँ खुद को
अपने ही नगमो में अधूरा छोड़ जाता हूँ खुद को
अपने ही नगमो में अधूरा छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी लम्हों की बगावत में दहकता छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी ख़ामोशी भरी तनहाई में पिघलता छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी ख़ामोशी भरी तनहाई में पिघलता छोड़ जाता हूँ खुद को
ये जिंदगी खुशी भी है गम भी है मेरे हुजूर
कभी कतरा कतरा अश्कों में लुढ़कता छोड़ जाता हूँ खुद को
तो कभी मोती मोती मुस्कुराहट में चमकता छोड़ जाता हूँ खुद को
तो कभी मोती मोती मुस्कुराहट में चमकता छोड़ जाता हूँ खुद को
कभी जीत जाता हूँ तो कभी शिकस्त खाता हूँ "कुणाल"
मैं जब ग़ज़ल करता हूँ तो बेबाक सा बेतहासा छोड़ जाता हूँ ख़ुद को।।।।
©किशोर कुणाल
मैं जब ग़ज़ल करता हूँ तो बेबाक सा बेतहासा छोड़ जाता हूँ ख़ुद को।।।।
©किशोर कुणाल
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