सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

दिल से लिखू या दिमाग़ से लिखू

दिल से लिखू या दिमाग़ से लिखू
तुम्हारे लिए कोई ग़ज़ल बेमिशाल लिखू
दिल की काग़ज अब तक कोरी है
क्या तुम्हारी यादों के नाम पर क़ुरान लिखू
पत्थर से टकराते टकराते घायल हो चुके हाथ
तेरी मूरत पर मैं कैसे अपना नाम लिखू
कुछ बाते कुछ मुलाकाते हर लफ़्ज हर लहज़ा
तेरी बातें भी मैं कैसे सरेआम लिखू
शायद तूने अपने डायरी के आख़री पन्ने भी भर दिए
अब बता अपने नाम का कैसे पहचान लिखू
जख़्म से ज़्यादा अब ज़मीर तक़लीफ़ देती है "कुणाल"
तेरे मुहब्बत के दस्तावेज़ पर मैं अपना दस्तख़त किस अदा के साथ लिखू
©किशोर कुणाल।।

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