मैं युही शब्दों को कविता की शक्ल नहीं दे देता हूँ
जब दिल में विचारो के घर्षण से आग लगती है सीने में, तब कलम से लहू निकल जाते है
जब दिल में विचारो के घर्षण से आग लगती है सीने में, तब कलम से लहू निकल जाते है
मैं युही लफ्ज़ो को नज़्म में ढाल नहीं देता हूँ
जब जज्बातों की शाखों पर मुहब्बत की नई कोंपले खिलती है तब रोशनाई से खुशबु निकलने लगती है
जब जज्बातों की शाखों पर मुहब्बत की नई कोंपले खिलती है तब रोशनाई से खुशबु निकलने लगती है
मैं युही भावनाओं की साज पर अपनी गजलें गुनगुनाता नहीं हूँ
जब सुन्दर एहसासो से सराबोर हो जाता हूँ तब क़लम की शिराओं से फूल झरने लगते है
जब सुन्दर एहसासो से सराबोर हो जाता हूँ तब क़लम की शिराओं से फूल झरने लगते है
मैं युही एक एक अरमानों को अपने शायरी में नहीं पिरोता हूँ
जब मन भी हिरण की तरह जंगल में भटकता है तब कलम गीत मल्हार गाने लगती है
जब मन भी हिरण की तरह जंगल में भटकता है तब कलम गीत मल्हार गाने लगती है
बस युही क़ैद कर लेता हूँ "कुणाल" कागज़ में खुद को,
जब कभी बाँसुरी की धुन पर कोई मीरा खो जाती है बेवफ़ाई में कोई कालिदास बन जाता है, जब अभिमान में महाभारत हो जाता है और वर्षो बाद जब किसी मजनु की मज़ार पर कोई चादर चढ़ाता है तब एक मेरी लेखनी भी भावनाओ के रंग उगलती है।
© किशोर कुणाल।।।।
जब कभी बाँसुरी की धुन पर कोई मीरा खो जाती है बेवफ़ाई में कोई कालिदास बन जाता है, जब अभिमान में महाभारत हो जाता है और वर्षो बाद जब किसी मजनु की मज़ार पर कोई चादर चढ़ाता है तब एक मेरी लेखनी भी भावनाओ के रंग उगलती है।
© किशोर कुणाल।।।।
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