पलकों की पहरेदारी में रखा है सपनों को
अब नींद का इंतेज़ार क्यों करेंगे
अब नींद का इंतेज़ार क्यों करेंगे
एक तेरे भरोसे पर बेरंग छोड़ा है मन को
उधार के रंगों से जज़्बात को क्यों भरेंगे
उधार के रंगों से जज़्बात को क्यों भरेंगे
दिन रात का फासला रोज तय करता हूँ
भला डर डर कर आखिर क्यों जीयेंगे
भला डर डर कर आखिर क्यों जीयेंगे
चोर तब तक चोर नहीं होता जबतक पकड़ा न जाय
दुश्मनी ले ली तुम्हारे बाप से तो आख़िर क्यों डरेंगे
दुश्मनी ले ली तुम्हारे बाप से तो आख़िर क्यों डरेंगे
"कुणाल" सफ़ीना लेकर उतर ही गए भवर में
अब पतवार चलाने से आख़िर क्यों चूकेंगे।।
©किशोर कुणाल
अब पतवार चलाने से आख़िर क्यों चूकेंगे।।
©किशोर कुणाल
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