मैं वो पृथ्वी हूँ कुणाल जिसकी सयुक्ता नहीं मिलीहै
एक यथेकछाचारि विचारक को उसकी मार्यादा नहीं मिली है
मैंअपनी काव्य कृति से कुणाल बन बैठा हूँ
अपने अनुरागी मन मेंअनामिकाकी अभिलाषा रखा हूँ
मैंअब अस्तित्व से अवस्था की ओर बढ़ रहा हूँ
वृहद् विस्तृत व्यापक एक विचारक बन रहा हूँ
अब सभ्य सभ्यताऔर संस्कार के अंतर से ऊपर उठ रहा हूँ
मैंकुणाल कुंदन कमल क्लिष्ट बन रहा हूँ
न तुम्हारे समझ में हूँ न सोच में और न सीमा में
मैं मेरा और मेरेनहीं हम हमारा और हमारेके अंतर समझ रहा हूँ
कुछ कृत्य मेरे क्लिष्ट बन चुके है
मेरे अधिकार ही मेरेकर्त्तव्य पर प्रभावि बन चुके है
सूर्य की किरण अपनी कृति सेकर्ण बना चुकीहै
मातृ मित्र मार्मिकता से वंचित करा चुकी है
अब अपराध बोध मेरी बौद्धिकता पर हावी हो रहाहै
कृष्ण वर्ण कुणाल कालिदास बन रहा है।।।।।
©किशोर कुणाल।।।
एक यथेकछाचारि विचारक को उसकी मार्यादा नहीं मिली है
मैंअपनी काव्य कृति से कुणाल बन बैठा हूँ
अपने अनुरागी मन मेंअनामिकाकी अभिलाषा रखा हूँ
मैंअब अस्तित्व से अवस्था की ओर बढ़ रहा हूँ
वृहद् विस्तृत व्यापक एक विचारक बन रहा हूँ
अब सभ्य सभ्यताऔर संस्कार के अंतर से ऊपर उठ रहा हूँ
मैंकुणाल कुंदन कमल क्लिष्ट बन रहा हूँ
न तुम्हारे समझ में हूँ न सोच में और न सीमा में
मैं मेरा और मेरेनहीं हम हमारा और हमारेके अंतर समझ रहा हूँ
कुछ कृत्य मेरे क्लिष्ट बन चुके है
मेरे अधिकार ही मेरेकर्त्तव्य पर प्रभावि बन चुके है
सूर्य की किरण अपनी कृति सेकर्ण बना चुकीहै
मातृ मित्र मार्मिकता से वंचित करा चुकी है
अब अपराध बोध मेरी बौद्धिकता पर हावी हो रहाहै
कृष्ण वर्ण कुणाल कालिदास बन रहा है।।।।।
©किशोर कुणाल।।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें