सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय
वेदों के ज्ञान से उपनिषदों की तृष्णा पूर्ण हो जाय
नहीं लिख सके जो तुलसीदास वो उर्मिला का विलाप हो जाय
लक्ष्मण के विरह का काश राम को एहसास हो जाय
कवि ह्रदय की पीड़ा समझों अश्कों से न समंदर हो जाय
चिंतन के हिमालय से निकले मेरी काव्यगंगा न खो जाय
"कुणाल" कवि विचलित प्रेमतृष्णा का तुम्हे भी एहसास हो जाय
मेरे स्वप्निल स्मृतियों में तुम्हे देखु मुझे पारलौकिकता का एहसास हो जाय।।
©किशोर कुणाल

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