कर्मपथ पर कर्मी, मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ
मैं कुणाल संघर्षपथ पर कदम बढ़ा रहा हूँ
मैं कुणाल संघर्षपथ पर कदम बढ़ा रहा हूँ
अश्रु रक्त मिश्रित मैं घूंट घूंट पी रहा हूँ
मैं वख़्त कि धारा के विरुद्ध तैर रहा हूँ
मैं वख़्त कि धारा के विरुद्ध तैर रहा हूँ
द्वन्द है प्रतिद्वन्द है घात और प्रतिघात सह रहा हूँ
मैं पांडवों वाले अज्ञातवास में रह रहा हूँ
मैं पांडवों वाले अज्ञातवास में रह रहा हूँ
ये अग्निपथ जटिल है कर्म पथ कठिन है
मैं कर्ण कुरुक्षेत्र में गड्ढे से रथ का पहिया निकाल रहा हूँ
मैं कर्ण कुरुक्षेत्र में गड्ढे से रथ का पहिया निकाल रहा हूँ
था वो अभिमन्यु जो फंस गया चक्रभियु में
मैं कृष्ण अपनों के लिए अब शस्त्र उठा रहा हूँ
मैं कृष्ण अपनों के लिए अब शस्त्र उठा रहा हूँ
मैं अपने कर्मो को अर्पित कर चूका, अब अपने बंधनो से मुक्त हूँ
मैं कुणाल अपने क्लेशों से अब अपराधों से मुक्त हूँ
ज्ञानरथ पर सवार गाण्डीव उठा रहा हूँ
मैं 'कुणाल' शँखनाद बजा रहा हूँ।।
©किशोर कुणाल
मैं कुणाल अपने क्लेशों से अब अपराधों से मुक्त हूँ
ज्ञानरथ पर सवार गाण्डीव उठा रहा हूँ
मैं 'कुणाल' शँखनाद बजा रहा हूँ।।
©किशोर कुणाल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें