बहुत लिख चूका हूँ ख़ुद को,
अब बस पढ़ना चाहता हूँ ख़ुद को,
अब बस पढ़ना चाहता हूँ ख़ुद को,
सर पर माँ की हाथो कि थपकिया चाहता हूँ
एक मासूम सी नींद अब सोना चाहता हूँ
एक मासूम सी नींद अब सोना चाहता हूँ
कुछ बनाना कुछ सजाना चाहता हूँ
जिंदगी को अब गुनगुनाना चाहता हूँ
जिंदगी को अब गुनगुनाना चाहता हूँ
जिस नज़्म को डायरी में गुलाब के साथ बंद रखा था
उसे जिंदगी के धुन पर गुनगुनाना चाहता हूँ
उसे जिंदगी के धुन पर गुनगुनाना चाहता हूँ
बस एक सिसक रह गई है "कुणाल" मासूम मोहबत वाली,
जिंदगी में वो ग़लती हर बार दोहराना चाहता हूँ
तू चाहे या फिर न चाहे मैं साथ निभाना चाहता हूँ।।।।।
©किशोर कुणाल।।।
जिंदगी में वो ग़लती हर बार दोहराना चाहता हूँ
तू चाहे या फिर न चाहे मैं साथ निभाना चाहता हूँ।।।।।
©किशोर कुणाल।।।
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