सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

समंदर भी जिसकी तलाश में रहे

समंदर भी जिसकी तलाश में रहे
वो कतरा अपनी पहचान रखता है
लहू के एक क़तरे का नाम है इंसान
जो गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलता है
एक लफ़्ज में सिमटी परी है कहानी
वो मत्ला ग़ज़ल की बुनियाद रखता है
तुम में जो सिमटी परी है सादगी
सौंदर्य भी एक अलग अल्फ़ाज रखता है
चन्द जज्बातों की भेंट चढ़ी पत्तियाँ
वो मेहबूब के हाथों पर हीना रखता है
पूरी दुनिया ही फरेबी है 'कुणाल'
हर हक़ीक़त जो अपनी छुपाकर रखता है ।।
© किशोर कुणाल

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