मंगलवार, 22 मई 2012

एक उडान

एक उडान  
एक खुला आसमान  जिसपर ,मेरा एकाधिकार 
राम रावन की लड़ाई नहीं
वर्चश्व  का महा संग्राम सौ कौरव नहीं ,हजार दुर्योधन 
सुई की नोख के सामान भूमि नहीं ,सर्व संसार का इनाम 
राजनीति हो या कूटनीति सिर्फ एक विजयनीति
एक कुरुक्षेत्र  से काम नहीं चलेगा पूरी विश्वस्थल 
बाहुबल हो या बुद्धिबल 
कोई राजा  रानी की कहानी नहीं एक विध्वंसकारी महागाथा 
जिसपर मेरे सपने का आकाश  
जिसपर नवनिर्माण की बुनियाद 
ऐसा तैसा नवनिर्माण नहीं एक समाजवादी नवनिर्माण 
राजतन्त्र  नहीं लोकत्रंत ही सही एक सच्ची, विश्वसनीय , भरष्टाचार  मुक्त ,प्रत्यक्ष पारदर्शी सर्व विश्व में एकमात्र महालोक्तंत्र  
न हिदुत्व की जातियता, न इस्लाम की कट्टरता 
बस एक सर्वव्यापी मानवता विकास , विज्ञानं ,विद्वत्ता का साथ 
कोई काल्पनिक विचार नहीं 
बस मेरा एक विश्वास से भरा एक प्रयाश 
छोटे पंखो के साथ सही 
पर मेरी अपनी एक उडान...
(किशोर कुणाल)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

"""मुँह पर तो मुँछे उगा नहीं सके
बाते घर में फुल उगाने की करते हो

आज तक पैजामे का नारा सही ढंग से लगा न सके
बेटा जिन्स पहन कर तुम बहुत इतराते हो

पाव भाजी को बर्गर बना
उलटा सीधा बहुत खाते हो

हाई हैलो कह कर
बङो का पैर छुने में लजाते हो"""

(किशोर कुणाल)

बुधवार, 23 नवंबर 2011

""""किसी की याद में कल रात जो हम सो न सके,

आज दिन के आलम में भी उनके आँखो का नूर हम समेट न सके""""

शनिवार, 19 नवंबर 2011

मेरा स्वाभिमान

"""प्यार दिखाते तो
बर्फ से पानी बन जाता
जरा सा ईज्जत देते तो
जान तक लुटा जाता
माना हिमालय जैसी
हैसियत नहीं मेरी
इसका अर्थ यह नहीं की
कोई तुफान मेरी नीव हिला सके"""

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011


""""किसी का दुखः कितनों का तमाशा बन जाता हैं

अपना सर्वश लुटने के बाद भी उपर सेगाल पर तमाचा लगा जाता है

कितने नंगी आँखे नंगा बना देती है

भरे बजार बजारू बना करछोङती है।""""

( किशोर कुणाल )

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

"""मेरी कलपनाओं का सागर सिमट जाता है कागज के चन्द चिथरों में ।


सारी कहानी बयाँ हो जाती है बस चन्द शब्दों में


भावनाओं की उबाल कैद हो जाती है एक कविता में


पता नहीं क्यों कोई दिल की छोटी सी बात नही समझ पाता नजरों की एक टकराहट में।"""

(किशोर कुणाल)

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

मानव मन

गजब है अजब है,
कुछ तो सोच के परे है,
आकार है निराकार है,
गलत है सही है,
सत्य है असत्य है,
पाप है पूण्य है,

जहाँ देखो वहाँ कई मापदण्ड है,
बेचारा मानस जाये कहाँ,
अपनी शिकायत सुनाये कहाँ,
जिसको मानता है वह तो खुद पत्थर का बन बैठा है,
जिसके अस्तिवत्व पर ही सवाल उठते है,
एक तरफ सामाज और कानून ,
जिसके पास सिर्फ दण्ड का विधान,
और दूसरी तरफ धर्म और विशवास,
जो भय, विशवास, सिद्धांत ,परमपराओं पर, निर्धारण करता है,
मानव मन बहुत फेर मे पङा,
गलत सही के चक्कर में पङा,
जरूरत और सही गलत में फसा......

(किशोर कुणाल)