सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

प्रिय मैं तुमसे प्रेम करना छोड़ दूंगा

जीवन के संघर्षों से अब हर नाता मैं तोड़ दूंगा
सच कहता हूँ प्रिय मैं तुमसे प्रेम करना छोड़ दूंगा
"कुणाल" कवि क्रोधित, अब अमृत कलश तोड़ दूंगा
मेरे मन मंदिर में बैठी देवी मैं तेरी पूजा करना छोड़ दूंगा
मैं पवित्र आत्मा प्रेम प्रिय
तुम धन उपभोग की तृष्णा प्रिय
मैं वैरागी, सांसारिक उपभोग नहीं दे पाऊंगा
मैं सघर्ष का योद्धा प्रिय, राजसुख नहीं दे पाऊंगा
परन्तु वचन था मेरा मेरी साँसों से
मन के आँगन को तुम्हारे लिए मैं वृन्दावन कर देता
जीवन पथ से हर कांटे चुन प्रकृति के फूल भर देता
मैं सूरा सुंदरी का प्यासा नहीं, मैं जीवन भर कटिबद्ध रहता
तुम्हारे लिए जीवन तो क्या मैं स्वर्ग तक को छोड़ देता
इसलिए मैं कहता हूँ तुम नहीं हो मेरे लायक प्रिय
मैं कलयुग में जन्मा राम मगर तुम नहीं मेरी सीता प्रिय
मैं हूँ गोकुल का कृष्ण पर तुम नहीं मेरी राधा प्रिय
इसलिए मैं कहता हूँ
जीवन के प्रश्नों का अब कोई नहीं उत्तर दूंगा
अब तुमसे प्रिय मैं हर रिश्ता तोड़ दूंगा
जीवन के संघर्षों से हर नाता मै तोड़ दूंगा
सच कहता हूँ प्रिय मैं प्रेम करना छोड़ दूंगा।।
©किशोर कुणाल

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो

मैं स्वाभिमान का सागर हूँ तुम समर्पण की गंगा हो
खुद में जो घुट घुट कर मरे मुझ सागर की गंभीरता हो
मैं लहरों की चंचलता हूँ तुम तट की स्थिरता हो
चकोर जिस तृष्णा में बैठे तुम चन्द्रप्रभा की शीतलता हो
जो शब्दों में अपनी दवा ढूँढे तुम मुझ कवी की रचना हो
प्रेम प्रिय प्रियतमा नहीं, मेरे मन आगँन की अल्पना हो
कल्पवृक्ष की सोनजुही, स्वर्ग की पारिजात हो
क्षीर सागर के मंथन से निकली तुम तो अमृतपाश हो
मृत कुमार जीवन में तुम नवविवाहिता प्राण हो
सदासुहागन जीवन में तुम यौवन का उपहार हो
देखो "कुणाल" कवी कल्पित बैठा, तुम तो हर्ष का संचार हो
मेरे सांसो के स्पंदन क्रम को रोकती, तुम वीना की तान हो ||
©किशोर कुणाल

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय

अर्धतृप्त मन की अधूरी अभिलाषा पूर्ण हो जाय
वेदों के ज्ञान से उपनिषदों की तृष्णा पूर्ण हो जाय
नहीं लिख सके जो तुलसीदास वो उर्मिला का विलाप हो जाय
लक्ष्मण के विरह का काश राम को एहसास हो जाय
कवि ह्रदय की पीड़ा समझों अश्कों से न समंदर हो जाय
चिंतन के हिमालय से निकले मेरी काव्यगंगा न खो जाय
"कुणाल" कवि विचलित प्रेमतृष्णा का तुम्हे भी एहसास हो जाय
मेरे स्वप्निल स्मृतियों में तुम्हे देखु मुझे पारलौकिकता का एहसास हो जाय।।
©किशोर कुणाल

इस कदर इन्सान को इतना मजबूर मत बनाओ,

इस कदर इन्सान को इतना मजबूर मत बनाओ,
तू अगर ख़ुदा है तो इंसान को क़ातिल मत बनाओ,
ज़ुल्म सह कर जो उफ़्फ़ तक नहीं करते जो लोग
उनके लिए दवा न बना सके तो जख्मों पर नमक मत लगाओ
तमाम रिस्तों को छोड़ कर आ गया हूँ तुम्हारे ख़ातिर
मुझे अपना न बना सकी तो अजनबी तो मत बनाओ
क्या करते हो "कुणाल" तहज़ीब के दायरे में लिखा करों गजलों को
कैसी माँ हूँ बच्चो को शरीफ न बना सकी तो आवारा तो मत बनाओ।।।
©किशोर कुणाल

सादगी से बढ़कर सौन्दर्य हो नहीं सकता

सादगी से बढ़कर सौन्दर्य हो नहीं सकता
तू अगर सोना है तो पीतल हो नहीं सकता
ख़ूबसूरती से भी बढ़कर होती है सीरत की कीमत
तेरे अंदर अगर गुण है तो वो छुप नहीं सकता
आदमी की फ़ितरत भले हो जाय रास्ता रोकने की
जिसको आगे बढ़ना हो उसको कोई रोक नहीं सकता
भले तूने जाने कितने भी जुर्म किए हो
हिसाब का दिन भी आएगा और तू बच नहीं सकता
भले कच्ची उम्र में मोहब्बत का तजुर्बा हो कम
जो बग़ावत कर नहीं सकता वो हाथ थाम नहीं सकता
सच्चे एहसासों की आज भी बहुत कीमत है "कुणाल"
जिसने सच्ची मोहब्बत की हो वो अय्याशी कर नहीं सकता।।
©किशोर कुणाल

पलकों की पहरेदारी में रखा है सपनों को

पलकों की पहरेदारी में रखा है सपनों को
अब नींद का इंतेज़ार क्यों करेंगे
एक तेरे भरोसे पर बेरंग छोड़ा है मन को
उधार के रंगों से जज़्बात को क्यों भरेंगे
दिन रात का फासला रोज तय करता हूँ
भला डर डर कर आखिर क्यों जीयेंगे
चोर तब तक चोर नहीं होता जबतक पकड़ा न जाय
दुश्मनी ले ली तुम्हारे बाप से तो आख़िर क्यों डरेंगे
"कुणाल" सफ़ीना लेकर उतर ही गए भवर में
अब पतवार चलाने से आख़िर क्यों चूकेंगे।।
©किशोर कुणाल